करीब 44,605 करोड़ रुपये की इस परियोजना को देश की पहली इंटरस्टेट नदी जोड़ो योजना माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य केन नदी के पानी को बेतवा बेसिन में ले जाकर सिंचाई और पेयजल संकट दूर करना है। लेकिन स्थानीय लोगों और पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इसके गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक दुष्परिणाम हो सकते हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस परियोजना से हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र, लाखों पेड़ और पन्ना टाइगर रिजर्व का बड़ा हिस्सा प्रभावित हो सकता है, जिससे वन्यजीवों और बाघों के अस्तित्व पर भी संकट गहराने की आशंका जताई जा रही है।
आदिवासी समुदायों का आरोप है कि उन्हें पर्याप्त पुनर्वास और जमीन के बदले जमीन नहीं दी जा रही, जबकि प्रशासन इसे विकास के लिए जरूरी कदम बता रहा है। इसी बीच ‘चिता आंदोलन’ और अन्य प्रतीकात्मक विरोधों ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है।
दूसरी ओर, विशेषज्ञों का एक वर्ग दावा कर रहा है कि बुंदेलखंड में पहले से मौजूद चंदेलकालीन तालाब, चेक डैम और पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणाली को पुनर्जीवित करके भी जल संकट का समाधान संभव है। कुछ शोध बताते हैं कि स्थानीय जल संरचनाओं से कृषि उत्पादन और भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार की यह मेगा परियोजना ही स्थायी समाधान है या फिर स्थानीय और पारंपरिक जल प्रबंधन मॉडल ज्यादा टिकाऊ विकल्प साबित हो सकते हैं।
