यह मामला तब सामने आया जब दमोह पुलिस की जांच में संजीवनी क्लीनिक से जुड़े दो अन्य फर्जी डॉक्टरों के दस्तावेज संदिग्ध पाए गए। जांच आगे बढ़ी तो जबलपुर के चेरीताल स्थित क्लीनिक में पदस्थ अजय मौर्य का नाम सामने आया, जिसे बाद में हिरासत में लिया गया।
सूत्रों और जांच रिपोर्ट के अनुसार अजय मौर्य मार्च 2025 में क्लीनिक में नियुक्त हुआ था और डेढ़ साल से अधिक समय तक यहां कार्यरत रहा। इस दौरान वह हर महीने नियमित रूप से वेतन लेता रहा, लेकिन मरीजों के इलाज में उसकी भूमिका बेहद सीमित रही। क्लीनिक स्टाफ और मरीजों के अनुसार वह केवल दो घंटे के लिए आता था और ज्यादातर समय अपने केबिन में बैठा रहता था।
स्थानीय मरीजों ने बताया कि इलाज का पूरा काम काउंटर पर बैठे स्टाफ द्वारा ही किया जाता था। मरीजों की समस्या सुनकर वहीं दवा दे दी जाती थी और डॉक्टर से मिलने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी। कई मरीजों ने यह भी कहा कि उन्होंने डॉक्टर अजय मौर्य को कभी गंभीर रूप से मरीजों का परीक्षण करते नहीं देखा।
क्लीनिक में कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटर ने भी इस बात की पुष्टि की कि डॉक्टर रोजाना केवल कुछ समय के लिए आते थे और जल्दी चले जाते थे। किसी को अंदेशा नहीं था कि उनके दस्तावेज फर्जी हो सकते हैं।
जांच में यह भी सामने आया है कि तीनों आरोपी डॉक्टर एनएचएम के तहत संविदा पर नियुक्त किए गए थे और पिछले कुछ वर्षों में लाखों रुपये वेतन के रूप में प्राप्त कर चुके थे। अकेले अजय मौर्य ने ही करीब 14 लाख रुपये से अधिक वेतन ले लिया था।
इस पूरे मामले ने स्वास्थ्य विभाग और एनएचएम की भर्ती प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि वॉक-इन इंटरव्यू के जरिए की गई नियुक्तियों में दस्तावेजों की सही तरह से जांच नहीं की गई। इसी का फायदा उठाकर फर्जी डिग्रीधारी लोगों ने सरकारी सिस्टम में घुसपैठ कर ली।
जांच एजेंसियों को आशंका है कि यह मामला सिर्फ तीन लोगों तक सीमित नहीं है और प्रदेश में 70 से अधिक फर्जी डॉक्टर इसी तरह सरकारी या निजी क्लीनिकों में काम कर सकते हैं। इसके पीछे एक संगठित नेटवर्क की भी संभावना जताई जा रही है, जो फर्जी डिग्री और मेडिकल रजिस्ट्रेशन तैयार कराने का काम करता है।
फिलहाल पुलिस ने इस पूरे नेटवर्क के मास्टरमाइंड हीरा सिंह कौशल को गिरफ्तार कर लिया है और उससे पूछताछ के आधार पर अन्य आरोपियों की तलाश तेज कर दी गई है। यह मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं और जांच लगातार जारी है।
