यह मामला सिवनी जिले के देवरी तहसील निवासी कुलपत दास कुलदीप से जुड़ा है, जो कटनी-सिंगरौली रेल लाइन के दोहरीकरण कार्य में मजदूरी कर रहे थे। 19 दिसंबर 2018 को कार्य के दौरान मालगाड़ी से कोयले का बड़ा टुकड़ा गिरने से उनकी दर्दनाक मौत हो गई थी, जिसके बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।
पति की मौत के बाद उनकी पत्नी बबली ने वर्ष 2019 में कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के तहत मुआवजे की मांग को लेकर लेबर कोर्ट में दावा प्रस्तुत किया था। लेकिन केस लंबित रहने के दौरान 3 नवंबर 2023 को पत्नी बबली का भी निधन हो गया, जिसके बाद यह जिम्मेदारी तीनों नाबालिग बच्चों के नाना प्रेमदास ने संभाली।
वर्तमान में तीनों बच्चे, जिनकी उम्र 9 से 12 वर्ष के बीच है, अपने नाना के सहारे न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। 4 मई 2026 को मामले की अंतिम बहस पूरी हो चुकी थी, लेकिन इसी दौरान यह बात सामने आई कि मृतक के रोजगार से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं हैं।
इसके बाद बच्चों की ओर से लेबर कोर्ट में आवेदन प्रस्तुत कर संबंधित दस्तावेजों को तलब करने की मांग की गई, लेकिन उस पर सुनवाई नहीं हुई। अधिवक्ता राकेश सिंह ने अदालत को बताया कि दस्तावेजों के बिना न्यायपूर्ण निर्णय संभव नहीं है, फिर भी आवेदन पर विचार नहीं किया गया।
लेबर कोर्ट के इस रवैये के बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां जस्टिस विवेक जैन ने सुनवाई करते हुए स्पष्ट निर्देश दिए कि कर्मचारी क्षतिपूर्ति आयुक्त पहले दस्तावेजों से जुड़े आवेदन पर निर्णय लें और उसके बाद ही अंतिम फैसला सुनाया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि आवेदन खारिज किया जाता है, तो बच्चों को उस आदेश को चुनौती देने के लिए पर्याप्त समय और अवसर दिया जाए।
हाईकोर्ट का यह फैसला न सिर्फ कानूनी प्रक्रिया की पारदर्शिता को मजबूत करता है, बल्कि तीन मासूम बच्चों के भविष्य को लेकर एक उम्मीद की किरण भी लेकर आया है, जो अपने माता-पिता को खोने के बाद न्याय की लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं।
