युवा कलाकारों ने कैनवास पर साकार की बुंदेलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत
झाँसी। बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी के 31वें दीक्षांत समारोह के उपलक्ष्य में ललित कला संस्थान द्वारा आयोजित सात दिवसीय राष्ट्रीय चित्रकला कार्यशाला ‘बुंदेली वसुधा’ का समापन समारोह गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। सात दिनों तक चली इस कार्यशाला में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए कलाकारों एवं विद्यार्थियों ने बुंदेलखण्ड की लोक संस्कृति, लोकजीवन, पारंपरिक शिल्प, स्थापत्य कला एवं प्राकृतिक सौंदर्य को कैनवास पर सजीव रूप प्रदान कर क्षेत्रीय सांस्कृतिक विरासत को नई कलात्मक अभिव्यक्ति दी।

समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुकेश पाण्डेय ने कहा कि ललित कला संस्थान सदैव विश्वविद्यालय की रचनात्मक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में अग्रणी भूमिका निभाता रहा है। उन्होंने कहा कि संस्थान के विद्यार्थियों ने अपनी कल्पनाशीलता, तकनीकी दक्षता और सृजनात्मक दृष्टि के माध्यम से ऐसे चित्रों का निर्माण किया है, जो बुंदेलखण्ड की कला, संस्कृति, लोकजीवन, शिल्प एवं वास्तुकला के जीवंत दस्तावेज के रूप में स्थापित होंगे। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों की कृतियों में दिखाई देने वाली साधना, अनुशासन और कलात्मक समर्पण अत्यंत प्रेरणादायी है तथा उनकी कला निश्चित रूप से समाज में सकारात्मक चेतना का संचार करेगी। कुलपति ने विद्यार्थियों को कला को रोजगारपरक स्वरूप प्रदान करने और अपनी प्रतिभा को आत्मनिर्भरता से जोड़ने का भी आह्वान किया।

मुख्य अतिथि प्रो. मुन्ना तिवारी ने कहा कि ललित कला संस्थान के विद्यार्थी अपने शिक्षकों के कुशल मार्गदर्शन में उत्कृष्ट सृजन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यहां की शिक्षा केवल रंगों, रेखाओं और कैनवास तक सीमित नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व, संवेदनशीलता और सृजनात्मक दृष्टिकोण का भी विकास करती है। उन्होंने कहा कि संस्थान के विद्यार्थियों ने विभिन्न कलाविधाओं में अपनी प्रतिभा का प्रभावशाली प्रदर्शन कर यह सिद्ध किया है कि ऐसी कार्यशालाएँ उन्हें नई तकनीकों से परिचित कराने के साथ-साथ सीखने, संवाद स्थापित करने और सृजनात्मक विकास का व्यापक अवसर प्रदान करती हैं।

विशिष्ट वक्ता एवं कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. पुनीत बिसरिया ने कहा कि बुंदेली माटी की सांस्कृतिक सुगंध सदैव विशिष्ट रही है और वीरभूमि बुंदेलखण्ड में कला का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। उन्होंने कहा कि संस्थान के विद्यार्थी परंपरागत कलाशैली को आधुनिक सृजनात्मक दृष्टि के साथ आत्मसात करते हुए अपेक्षा से अधिक उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं, जो उनके समर्पण और कार्यकुशलता का परिचायक है।
कार्यक्रम का संचालन एवं कार्यशाला की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए समन्वयक डॉ. श्वेता पाण्डेय ने सात दिवसीय कार्यशाला की विभिन्न गतिविधियों एवं उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कार्यशाला के माध्यम से बुंदेली संस्कृति, लोकजीवन, ग्रामीण परिवेश तथा आसपास के क्षेत्रों की विविध सांस्कृतिक विशेषताओं को चित्रों के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान की गई। उन्होंने कुलपति प्रो. मुकेश पाण्डेय के मार्गदर्शन के प्रति आभार व्यक्त करते हुए बताया कि कार्यशाला में 50 से अधिक कलाकारों ने अपनी उत्कृष्ट कलाकृतियों का सृजन किया।
समापन अवसर पर कुलपति प्रो. मुकेश पाण्डेय ने सभी प्रतिभागी कलाकारों एवं विद्यार्थियों को प्रमाण-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया। कार्यक्रम के अंत में डॉ. अजय कुमार गुप्ता ने सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए युवा कलाकारों का उत्साहवर्धन करने एवं उनके मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस अवसर पर डॉ. सुनील त्रिवेदी, डॉ. सुनीता, डॉ. पुनीत, डॉ. श्रीहरि त्रिपाठी, गजेन्द्र सिंह, डॉ. रितु शर्मा, डॉ. दिलीप कुमार, डॉ. रानी शर्मा, डॉ. अंकिता शर्मा तथा डॉ. संतोष कुमार सहित बड़ी संख्या में कला प्रेमी, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यशाला का समापन बुंदेलखण्ड की सांस्कृतिक अस्मिता, कलात्मक परंपरा और युवा सृजनशीलता के उत्सव के रूप में हुआ, जिसने विश्वविद्यालय की रचनात्मक गतिविधियों को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की।
