सत्यवान-सावित्री कथा से जुड़ा है संबंध
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब सावित्री अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लाने के लिए यमराज के पीछे-पीछे जा रही थीं, तब ज्येष्ठ महीने की भीषण गर्मी में सत्यवान का शरीर निढाल हो गया था। कथा के अनुसार, सावित्री ने बांस के हाथ पंखे से उन्हें हवा देकर राहत पहुंचाई थी। तभी से वट सावित्री व्रत में बांस के पंखे का उपयोग परंपरा का हिस्सा बन गया।
पूजा में क्यों खरीदे जाते हैं दो पंखे?
मान्यता है कि वट सावित्री व्रत के दौरान महिलाएं दो बांस के पंखे खरीदती हैं। पूजा के बाद इन पंखों को दान किया जाता है। धार्मिक विश्वास है कि इससे अखंड सौभाग्य, सुख-समृद्धि और परिवार में खुशहाली बनी रहती है। पूजा के दौरान पंखे को सेवा, समर्पण और पति-पत्नी के अटूट प्रेम का प्रतीक भी माना जाता है।
पंखा दान को माना गया है महादान
शास्त्रों में ज्येष्ठ माह की तपती गर्मी में पंखा दान करना बेहद पुण्यकारी बताया गया है। विशेष रूप से बांस का पंखा दान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है और जरूरतमंदों को राहत मिलती है। इसी वजह से वट सावित्री व्रत की पूजा के बाद महिलाएं पंखा दान करने की परंपरा निभाती हैं।
बांस को माना जाता है वंश वृद्धि का प्रतीक
हिंदू धर्म में बांस को शुभ और वंश वृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसलिए बांस से बने पंखे का उपयोग केवल धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि परिवार की खुशहाली, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा से भी जुड़ा माना जाता है।
