नई दिल्ली । दिवंगत उद्योगपति संजय कपूर की संपत्ति और आरके फैमिली ट्रस्ट से जुड़े पारिवारिक विवाद में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में चल रही मध्यस्थता प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अनुमति देते हुए इसकी अवधि 2 नवंबर तक बढ़ा दी है। अदालत ने संकेत दिया कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और यदि यह प्रक्रिया इसी तरह जारी रही तो लंबे समय से चला आ रहा विवाद आपसी सहमति से समाप्त हो सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया के समानांतर बातचीत के माध्यम से समाधान निकालना सभी पक्षों के हित में होगा।
सुनवाई के दौरान अदालत ने मध्यस्थता से संबंधित रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद कहा कि अब तक की प्रगति संतोषजनक रही है। न्यायालय ने विश्वास व्यक्त किया कि संबंधित पक्ष समाधान के काफी करीब पहुंच चुके हैं। इसी आधार पर मध्यस्थता को अतिरिक्त समय देने का निर्णय लिया गया। साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि मध्यस्थ की फीस का भुगतान आरके फैमिली ट्रस्ट की ओर से किया जाएगा। यदि निर्धारित अवधि में सहमति नहीं बनती है तो सभी पक्ष कानून के अनुसार आगे की न्यायिक कार्यवाही करने के लिए स्वतंत्र होंगे।
यह विवाद उद्योगपति संजय कपूर के निधन के बाद उनकी विशाल संपत्ति और व्यावसायिक हिस्सेदारी के अधिकारों को लेकर शुरू हुआ था। जून 2025 में उनके निधन के बाद परिवार के विभिन्न सदस्यों के बीच उत्तराधिकार और ट्रस्ट के संचालन को लेकर मतभेद सामने आए। मामले में संजय कपूर की मां रानी कपूर, पत्नी प्रिया कपूर तथा उनकी पहली पत्नी करिश्मा कपूर से हुए बच्चों समायरा और कियान कपूर के हितों और अधिकारों को लेकर भी कई कानूनी प्रश्न उठे। इसी कारण यह मामला पहले निचली अदालतों और बाद में सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा।
संजय कपूर और करिश्मा कपूर का विवाह वर्ष 2003 में हुआ था, जबकि दोनों वर्ष 2016 में अलग हो गए थे। उनके दो बच्चे हैं, जिनके भविष्य के लिए संजय कपूर ने विभिन्न आर्थिक प्रबंध किए थे। बाद में उन्होंने प्रिया कपूर से विवाह किया। उनके निधन के बाद परिवार के भीतर संपत्ति के प्रबंधन और लाभार्थियों के अधिकारों को लेकर विवाद गहराता चला गया। इसी पृष्ठभूमि में आरके फैमिली ट्रस्ट की भूमिका भी विवाद का प्रमुख कारण बनी।
विवाद का केंद्र वर्ष 2017 में गठित आरके फैमिली ट्रस्ट है। रानी कपूर का आरोप है कि इस ट्रस्ट का गठन उनकी जानकारी और सहमति के बिना किया गया तथा परिवार की संपत्तियों को इसमें शामिल कर दिया गया। उनका कहना है कि ट्रस्ट की वैधता पर गंभीर सवाल हैं और इसे समाप्त किया जाना चाहिए। दूसरी ओर प्रिया कपूर का पक्ष है कि ट्रस्ट सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए स्थापित किया गया था तथा इसका उद्देश्य लाभार्थियों के हितों की रक्षा करना है। उनका यह भी कहना है कि ट्रस्ट के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप से उसके संचालन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
दोनों पक्षों के बीच बढ़ते विवाद को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही मध्यस्थता का रास्ता अपनाने का निर्णय लिया था। अदालत ने इस प्रक्रिया की निगरानी के लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को मध्यस्थ नियुक्त किया था। अब मध्यस्थता की अवधि बढ़ाए जाने से यह संकेत मिला है कि अदालत कानूनी संघर्ष के बजाय सहमति आधारित समाधान को प्राथमिकता देना चाहती है। यदि आने वाले महीनों में बातचीत सफल रहती है तो यह मामला लंबी न्यायिक प्रक्रिया से बचते हुए शांतिपूर्ण तरीके से समाप्त हो सकता है।
