ईरान के विदेश मंत्रालय के अनुसार दोनों देशों के बीच नए शिपिंग रूट और उसके संचालन से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदुओं पर व्यापक सहमति बन चुकी है। अब समझौते को अंतिम रूप देने के लिए संयुक्त बयान की तैयारी की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि नए समुद्री मार्ग के भौगोलिक निर्देशांक तय किए जा चुके हैं और तकनीकी स्तर पर अधिकांश प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं। इससे संकेत मिल रहे हैं कि समझौते की औपचारिक घोषणा जल्द की जा सकती है।
प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों को निर्धारित समुद्री मार्ग का पालन करना होगा। सुरक्षा, निगरानी और नौवहन सहायता की जिम्मेदारी ईरान और ओमान संयुक्त रूप से निभाएंगे। इसके बदले जहाजों से सर्विस फीस वसूली जाएगी, जिसे दोनों देशों के बीच बराबर-बराबर बांटा जाएगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य समुद्री यातायात को अधिक संगठित और सुरक्षित बनाना बताया जा रहा है।
अमेरिका ने इस प्रस्तावित समझौते पर गंभीर आपत्ति जताई है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर ऐसी कोई व्यवस्था स्वीकार्य नहीं हो सकती, जिससे मुक्त और निर्बाध नौवहन के सिद्धांत पर प्रभाव पड़े। अमेरिका का मानना है कि वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर सभी देशों को समान और स्वतंत्र पहुंच मिलनी चाहिए तथा किसी भी नई व्यवस्था से अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों के मूल सिद्धांत प्रभावित नहीं होने चाहिए।
ईरान का कहना है कि प्रस्तावित मॉडल का उद्देश्य समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना और जहाजों के सुरक्षित आवागमन को सुनिश्चित करना है। अधिकारियों के अनुसार नई व्यवस्था इस प्रकार तैयार की गई है कि वाणिज्यिक जहाज अपनी यात्रा के दोनों चरणों में निर्धारित समुद्री क्षेत्र से होकर गुजरेंगे, जिससे यातायात प्रबंधन अधिक प्रभावी बनाया जा सके। ईरान का यह भी दावा है कि यह व्यवस्था क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने और समुद्री गतिविधियों में पारदर्शिता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।
होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत रणनीतिक महत्व रखता है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल और ऊर्जा संसाधन इसी मार्ग से होकर गुजरते हैं। ऐसे में इस क्षेत्र में लागू होने वाली किसी भी नई व्यवस्था का प्रभाव केवल क्षेत्रीय देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी पड़ सकता है। अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि ईरान और ओमान इस समझौते को कब अंतिम रूप देते हैं और इसके बाद वैश्विक शक्तियों की प्रतिक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है।
