इतिहास के अनुसार जगदीशपुर किले का निर्माण 17वीं शताब्दी में देवड़ा चौहान राजपूत शासकों ने कराया था। उस समय यह क्षेत्र जगदीशपुर के नाम से जाना जाता था। बैरसिया पर अधिकार जमाने के बाद अफगान सरदार दोस्त मोहम्मद खान की नजर जगदीशपुर पर थी। इतिहासकारों के मुताबिक उसने यहां के राजपूत शासक नरसिंह देवड़ा को थाल यानी बाणगंगा नदी के किनारे संधि वार्ता और दावत के लिए बुलाया। दावत के दौरान दोस्त मोहम्मद खान किसी बहाने वहां से बाहर निकला और इसके बाद अचानक हमला कर दिया गया।
कहा जाता है कि नदी किनारे झाड़ियों में पहले से छिपे सैनिकों ने राजपूतों पर हमला बोल दिया। अचानक हुए इस हमले में बड़ी संख्या में राजपूत सैनिक मारे गए और दोस्त मोहम्मद खान ने जगदीशपुर पर कब्जा कर लिया। इसके बाद उसने इसी स्थान को अपनी पहली राजधानी बनाया और जगदीशपुर का नाम बदलकर इस्लामनगर कर दिया। यही सत्ता आगे चलकर भोपाल रियासत में तब्दील हुई और करीब ढाई सौ वर्षों तक यहां नवाबों और बेगमों का शासन रहा।
जगदीशपुर की कहानी से एक बेहद चर्चित लोककथा भी जुड़ी है। कहा जाता है कि उस नरसंहार में इतना रक्त बहा कि थाल यानी बाणगंगा नदी का पानी लाल हो गया था। इसी वजह से आगे चलकर इस नदी का नाम हलाली पड़ गया। हालांकि इस प्रसंग को इतिहास और लोकमान्यता के संदर्भ में अलग-अलग तरीके से देखा जाता है लेकिन यह कहानी आज भी जगदीशपुर के इतिहास का एक अहम हिस्सा मानी जाती है।
जगदीशपुर की कहानी से एक बेहद चर्चित लोककथा भी जुड़ी है। कहा जाता है कि उस नरसंहार में इतना रक्त बहा कि थाल यानी बाणगंगा नदी का पानी लाल हो गया था। इसी वजह से आगे चलकर इस नदी का नाम हलाली पड़ गया। हालांकि इस प्रसंग को इतिहास और लोकमान्यता के संदर्भ में अलग-अलग तरीके से देखा जाता है लेकिन यह कहानी आज भी जगदीशपुर के इतिहास का एक अहम हिस्सा मानी जाती है।
इस ऐतिहासिक स्थल का संबंध गिन्नौरगढ़ और रानी कमलापति की कहानी से भी जुड़ा है। गिन्नौरगढ़ गोंड साम्राज्य की अंतिम शासक रानी कमलापति की राजधानी थी। पति निजाम शाह की हत्या के बाद रानी ने दोस्त मोहम्मद खान से मदद मांगी थी। इसके बाद बदले राजनीतिक समीकरणों ने दोस्त मोहम्मद खान की ताकत बढ़ाई और जगदीशपुर उसकी सत्ता का प्रमुख केंद्र बन गया।
समय के साथ इस स्थान का नाम इस्लामनगर हो गया लेकिन वर्ष 2023 में राज्य सरकार ने इसका मूल नाम जगदीशपुर बहाल कर दिया। यहां मौजूद चमन महल आज भी इस ऐतिहासिक दौर की भव्यता को अपने भीतर समेटे हुए है। मुगल और राजपूत स्थापत्य शैली के मेल से बने इस महल के मेहराबदार बरामदे नक्काशीदार झरोखे खुले आंगन फव्वारे और बाग-बगीचे बीते दौर की शाही विरासत की कहानी कहते हैं। परिसर में रानी महल विशाल परकोटे बुर्ज और पुराने प्रवेश द्वार भी मौजूद हैं जो उस समय की सैन्य व्यवस्था और स्थापत्य कला की झलक देते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस ऐतिहासिक परिसर को संरक्षित स्मारक घोषित किया है।
आज जगदीशपुर सिर्फ एक किला नहीं बल्कि भोपाल की सत्ता के उदय राजनीतिक संघर्ष लोककथाओं और स्थापत्य विरासत को अपने भीतर समेटे इतिहास का जीवंत दस्तावेज है। इसकी दीवारों और खंडहरों में करीब तीन सदियों पुराने सत्ता संघर्ष की गूंज आज भी महसूस की जा सकती है।
