पहले कर्ज को मुख्य रूप से घर खरीदने, शिक्षा, कारोबार या किसी बड़ी आपात जरूरत से जोड़कर देखा जाता था। अब डिजिटल भुगतान व्यवस्था और ऑनलाइन शॉपिंग के विस्तार के साथ छोटे और रोजमर्रा के खर्चों के लिए भी क्रेडिट का इस्तेमाल बढ़ा है। क्रेडिट कार्ड, Buy Now Pay Later और छोटे व्यक्तिगत ऋण युवाओं को तत्काल खर्च करने की सुविधा देते हैं। खरीदारी के समय पूरी रकम चुकाने के बजाय कम मासिक किस्त दिखाई देती है, जिससे महंगा सामान भी आसानी से खरीदने योग्य नजर आने लगता है।
क्रेडिट व्यवहार से जुड़े आंकड़ों और विश्लेषणों से यह संकेत मिलता है कि अलग-अलग पीढ़ियों में पहली बार उधार लेने की उम्र कम हुई है। युवा वर्ग कम उम्र में ही क्रेडिट सिस्टम से जुड़ रहा है। इसका एक बड़ा कारण डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कुछ ही चरणों में उपलब्ध होने वाली ऋण और किस्त की सुविधा है। कई बार खरीदारी करते समय ही ग्राहक को EMI या Pay Later का विकल्प मिल जाता है। इससे खरीदारी का फैसला बचत और आय के आधार पर करने के बजाय तत्काल उपलब्ध किस्त के आधार पर होने लगता है।
इस बदलाव का सबसे बड़ा जोखिम तब सामने आता है, जब एक व्यक्ति एक साथ कई क्रेडिट सुविधाओं का इस्तेमाल करने लगता है। उदाहरण के लिए किसी युवा की मासिक आय 40 हजार रुपये है और वह मोबाइल, कपड़े, यात्रा तथा अन्य खर्चों के लिए अलग-अलग किस्त ले लेता है। प्रत्येक खरीदारी की EMI अकेले देखने पर छोटी लग सकती है, लेकिन महीने के अंत में सभी किस्तों का कुल भुगतान काफी बड़ा हो सकता है। इसके बाद जरूरी घरेलू खर्चों और बचत के लिए उपलब्ध रकम कम हो जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार क्रेडिट सुविधा अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन इसे अतिरिक्त आय समझना वित्तीय गलती हो सकती है। किसी बैंक या वित्तीय संस्था की ओर से दी गई क्रेडिट लिमिट का अर्थ यह नहीं है कि उतनी पूरी राशि खर्च करना सुरक्षित है। खर्च करने से पहले अपनी आय, मौजूदा कर्ज, मासिक किस्तों और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी है।
समय पर भुगतान नहीं होने की स्थिति में ब्याज, लेट फीस और अन्य शुल्क आर्थिक बोझ बढ़ा सकते हैं। लगातार भुगतान में देरी से क्रेडिट रिकॉर्ड पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए युवाओं के लिए जरूरी है कि केवल कम EMI देखकर खरीदारी का फैसला न करें। कुल भुगतान राशि, ब्याज, प्रोसेसिंग फीस और अन्य शुल्कों को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
बढ़ती डिजिटल क्रेडिट सुविधाओं के बीच वित्तीय अनुशासन ही सबसे बड़ा बचाव है। शौक और लाइफस्टाइल को पूरा करने के लिए लिया गया छोटा कर्ज अगर लगातार बढ़ता जाए तो वह भविष्य की बचत और आर्थिक स्वतंत्रता पर असर डाल सकता है। जरूरत और इच्छा के बीच अंतर समझकर खर्च करना तथा आय के अनुरूप ही उधारी लेना युवाओं को इस बढ़ते कर्ज के दबाव से बचा सकता है।
