नई दिल्ली। महंगाई (Inflation) की मार अब खाने की थाली (Food plate) तक और बढ़ सकती है। वैश्विक बाजार (Global market) में गेहूं की कीमतों (Wheat prices) में तेजी का असर घरेलू बाजार (Domestic Market) में भी दिखाई देने लगा है। फिलहाल गेहूं की कीमत करीब 6.7 डॉलर प्रति बुशेल के आसपास है, जो 24 जुलाई के बाद का सबसे ऊंचा स्तर बताया जा रहा है। पिछले एक महीने में देश की प्रमुख मंडियों में गेहूं के भाव 3.85 फीसदी तक बढ़ चुके हैं। अगर यह तेजी आगे भी बनी रहती है तो आटा, ब्रेड और गेहूं से बनने वाले दूसरे खाद्य उत्पादों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
काला सागर का तनाव गेहूं के लिए इतना अहम क्यों है?
गेहूं की कीमतों में तेजी के पीछे काला सागर क्षेत्र में बढ़ता तनाव बड़ी वजह बन रहा है। रूस और यूक्रेन दुनिया के गेहूं निर्यात में बड़ा हिस्सा रखते हैं। रूस की ओर से यूक्रेन के साथ काला सागर में संभावित युद्धविराम के प्रस्ताव को ठुकराए जाने के बाद वहां तनाव बना हुआ है। हमलों से समुद्री रास्तों पर शिपिंग प्रभावित हो रही है और निर्यात घटने की चिंता बढ़ी है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की आपूर्ति को लेकर आशंका पैदा हुई है।
घरेलू मंडियों में कितनी बढ़ी गेहूं की कीमत?
इस वैश्विक चिंता का असर भारतीय मंडियों में भी दिख रहा है। 17 जुलाई से 17 अगस्त के बीच राजकोट में गेहूं का भाव 2,600 रुपये से बढ़कर 2,700 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। दिल्ली में यह 2,782.50 रुपये से बढ़कर 2,870 रुपये, कानपुर में 2,620 रुपये से बढ़कर 2,700 रुपये और कोटा में 2,657.50 रुपये से बढ़कर 2,700 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। इंदौर में भी भाव 2,695 रुपये से बढ़कर 2,708.75 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गया। यानी कई प्रमुख मंडियों में एक महीने के भीतर कीमतें बढ़ी हैं।
क्या आगे भी बढ़ सकती हैं गेहूं की कीमतें?
गेहूं की कीमतों का आगे का रुख काला सागर क्षेत्र के हालात और मौसम पर निर्भर करेगा। अगर वहां तनाव और बढ़ता है तो अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर आयातक देशों के बाजारों पर पड़ सकता है। भारत में भी अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव का घरेलू बाजार पर असर पड़ता है। ऐसे में फिलहाल गेहूं के ऊंचे भाव चिंता का विषय बने हुए हैं। कीमतों में और तेजी आई तो इसका असर आटे और गेहूं से जुड़े दूसरे उत्पादों पर भी पड़ सकता है।
गेहूं के साथ प्याज ने भी क्यों बढ़ाई रसोई की चिंता?
महंगाई का दबाव केवल गेहूं तक सीमित नहीं है। दक्षिण भारत से खरीफ प्याज की आवक में देरी के बीच थोक मंडी में प्याज का भाव बढ़कर 32 रुपये प्रति किलो पहुंच गया है। 17 अगस्त 2026 को प्याज का अखिल भारतीय औसत खुदरा मूल्य 37.20 रुपये प्रति किलो दर्ज किया गया, जबकि एक महीने पहले यह 34.53 रुपये और एक साल पहले 26.86 रुपये प्रति किलो था। सरकार की ओर से न्यूनतम खरीद मूल्य में सात बार बढ़ोतरी के बावजूद प्याज की खरीद दो लाख टन के लक्ष्य से करीब 25 फीसदी कम रहने का अनुमान है। यानी गेहूं और प्याज दोनों की कीमतों में बढ़ोतरी ने घरेलू रसोई के बजट को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
