मंदिर के बारे में कहा जाता है कि जब बाहर तेज गर्मी पड़ रही होती है और आसमान पूरी तरह साफ दिखाई देता है तब भी गर्भगृह की छत पर नमी दिखाई देने लगती है। कुछ ही समय बाद पत्थरों से पानी की बूंदें गिरने लगती हैं। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यह संकेत बताता है कि अगले सात दिनों के भीतर मानसून दस्तक देने वाला है। वर्षों से इस दृश्य को देखने के लिए आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
इस मंदिर से जुड़ी एक और रोचक मान्यता यह है कि बूंदों के आकार और उनकी मात्रा के आधार पर लोग उस वर्ष होने वाली बारिश का अनुमान भी लगाते हैं। यदि बूंदें बड़ी और लगातार गिरती हैं तो इसे अच्छी और भरपूर वर्षा का संकेत माना जाता है। वहीं यदि बूंदें छोटी हों या कम मात्रा में गिरें तो लोग सामान्य या कम बारिश की संभावना मानते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जैसे ही वास्तविक मानसून शुरू होता है और बाहर बारिश होने लगती है वैसे ही मंदिर के भीतर बूंदों का गिरना बंद हो जाता है।
आसपास के किसानों के लिए यह परंपरा केवल आस्था का विषय नहीं बल्कि खेती की तैयारी का आधार भी बन चुकी है। मंदिर से संकेत मिलने के बाद किसान खेतों की जुताई बीज और अन्य कृषि कार्यों की तैयारी शुरू कर देते हैं। उनका मानना है कि पीढ़ियों से यह संकेत अधिकांश अवसरों पर सही साबित हुआ है इसलिए वे इसे प्राकृतिक चेतावनी के रूप में स्वीकार करते हैं।
इस रहस्य ने वैज्ञानिकों और पुरातत्व विशेषज्ञों का भी ध्यान आकर्षित किया है। समय-समय पर मंदिर की संरचना और पत्थरों की जांच की गई ताकि यह पता लगाया जा सके कि पानी आखिर कहां से आता है। कुछ विशेषज्ञ इसे नमी तापमान व वायुदाब में बदलाव जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाओं से जोड़कर देखते हैं जबकि अब तक कोई सर्वमान्य वैज्ञानिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है। यही कारण है कि यह घटना आज भी चर्चा और शोध का विषय बनी हुई है।
धार्मिक दृष्टि से यह मंदिर भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यह किसी चमत्कार से कम नहीं और भगवान स्वयं अपने भक्तों को मौसम का संकेत देते हैं। वहीं वैज्ञानिक समुदाय इसे प्राकृतिक कारणों से समझने की कोशिश कर रहा है। आस्था और विज्ञान के बीच यह रहस्यमयी परंपरा आज भी लोगों को आकर्षित करती है और कानपुर के इस प्राचीन मंदिर को देश के सबसे चर्चित धार्मिक स्थलों में शामिल करती है।
