झांसी। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी के पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय के सहायक प्राध्यापक डॉ. मानवेन्द्र सिंह ने बढ़ते तापमान के बीच पशुपालकों को हरा चारा खिलाने में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि अधिक गर्मी का पशुओं के पाचन तंत्र और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिससे उनके दूध एवं उत्पादन क्षमता में कमी आ सकती है।

डॉ. सिंह के अनुसार, गर्मी के मौसम में हरा चारा सुबह जल्दी या शाम के समय ही पशुओं को देना चाहिए तथा दोपहर की तेज धूप में चारा खिलाने से बचना चाहिए। उन्होंने बताया कि कटाई के तुरंत बाद हरा चारा पशुओं को नहीं खिलाना चाहिए, बल्कि उसे 2 से 3 घंटे छाया में मुरझाने देना चाहिए, इससे फुलाव और विषाक्तता का खतरा कम हो जाता है।
उन्होंने पशुपालकों को सलाह दी कि केवल हरा चारा देने के बजाय उसमें भूसा मिलाकर खिलाएं, इससे पाचन संतुलित बना रहे। साथ ही, यह भी ध्यान रखें कि चारा अत्यधिक गीला या ओस से भीगा हुआ न हो, क्योंकि इससे अपच और दस्त जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
डॉ. सिंह ने चेतावनी देते हुए बताया कि गर्मी के मौसम में ज्वार एवं बाजरा जैसे चारे में हाइड्रोसायनिक अम्ल बनने का खतरा बढ़ जाता है, जो पशुओं के लिए विषाक्त हो सकता है। इससे बचाव के लिए फसल को कम से कम 50 दिन बाद ही काटें और कटाई के बाद कुछ समय तक मुरझाने दें।
उन्होंने यह भी कहा कि दलहनी चारे जैसे बरसीम और लोबिया को सीमित मात्रा में तथा सूखे चारे के साथ मिलाकर ही खिलाना चाहिए। पशुओं को हमेशा साफ, ताजा और फफूंदी रहित चारा देना चाहिए तथा चारे को धूल, मिट्टी एवं रसायनों से दूषित होने से बचाना आवश्यक है।
डॉ. सिंह ने गर्मी में पशुओं को पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ और ठंडा पानी उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि पानी की कमी से चारे का पाचन प्रभावित होता है। साथ ही पशुओं को छायादार स्थान पर ही चारा खिलाएं और हरे चारे को भी सीधे धूप के बजाय छायादार एवं हवादार स्थान पर सुरक्षित रखें।
उन्होंने कहा कि इन सावधानियों को अपनाकर पशुपालक गर्मी के मौसम में अपने पशुओं को स्वस्थ रख सकते हैं और उत्पादन स्तर को बनाए रख सकते हैं।
