
नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश में निषाद समाज के आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है। विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के प्रमुख और बिहार के पूर्व मंत्री मुकेश सहनी ने बस्ती में आयोजित कार्यक्रम के दौरान आरक्षण को लेकर बड़ा राजनीतिक अभियान शुरू करने का ऐलान किया। उन्होंने ‘आरक्षण नहीं तो वोट नहीं’ का नारा देते हुए कहा कि यदि निषाद समाज को उसका अधिकार नहीं मिला तो आगामी चुनावों में समाज अपने मतदान के जरिए स्पष्ट संदेश देगा। उनके इस बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है।
अपने रात्रि प्रवास अभियान के दौरान कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए मुकेश सहनी ने कहा कि निषाद समाज अपने अधिकारों के लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाएगा। उन्होंने घोषणा की कि जल्द ही पूरे उत्तर प्रदेश में ‘संकल्प यात्रा’ निकाली जाएगी। इस यात्रा में बड़ी संख्या में समाज के लोग गंगाजल हाथ में लेकर आरक्षण की मांग को लेकर संकल्प लेंगे। उनका कहना था कि समाज अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रखेगा और चुनाव में भी इसी मुद्दे को प्रमुखता से उठाएगा।
मुकेश सहनी ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश में निषाद समाज का प्रभावी जनाधार है और यह वर्ग चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार विधानसभा चुनाव से पहले आरक्षण की मांग पूरी नहीं करती है तो समाज एकजुट होकर अपने राजनीतिक निर्णय लेगा। उनके अनुसार, आरक्षण का मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक न्याय और समान अवसर से जुड़ा विषय है।
इस दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री डॉ. संजय निषाद पर भी तीखा हमला बोला। सहनी ने आरोप लगाया कि निषाद समाज के आंदोलन और संघर्ष के कारण राजनीतिक पहचान हासिल करने वाले नेता अब समाज के मूल मुद्दों से दूर हो गए हैं। उन्होंने कहा कि यदि अगले छह महीने के भीतर आरक्षण को लेकर कोई ठोस प्रगति नहीं होती है तो संजय निषाद को मंत्री पद छोड़कर समाज के बीच संघर्ष की राजनीति में लौटना चाहिए। उन्होंने इसे समाज के प्रति नैतिक जिम्मेदारी बताया।
मुकेश सहनी ने जातीय जनगणना और आबादी के अनुपात में अधिकारों की मांग का भी समर्थन किया। उन्होंने कहा कि विभिन्न राज्यों में निषाद समाज की कुछ उपजातियों को आरक्षण का लाभ मिल रहा है, ऐसे में उत्तर प्रदेश में भी इस विषय पर समान दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। उनका कहना था कि समान अवसर और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया जाना आवश्यक है।
उन्होंने अपने संबोधन में यह भी कहा कि राजनीतिक दलों और नेताओं को समाज के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। उनके अनुसार, समाज अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट नहीं होगा बल्कि ठोस निर्णय और परिणाम चाहता है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से संगठन को मजबूत करने और गांव-गांव तक आरक्षण के मुद्दे को पहुंचाने का आह्वान किया।
मुकेश सहनी के इन बयानों के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में निषाद समाज के आरक्षण का मुद्दा फिर प्रमुखता से उभर आया है। आने वाले महीनों में प्रस्तावित संकल्प यात्रा और इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों की रणनीति प्रदेश की चुनावी राजनीति को प्रभावित कर सकती है। अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार और संबंधित पक्ष इस मांग पर क्या रुख अपनाते हैं और इसका राजनीतिक समीकरणों पर क्या असर पड़ता है।
