एलजी कप में विजय भारद्वाज ने अपनी ऑफ स्पिन गेंदबाजी से शानदार प्रदर्शन करते हुए 10 विकेट हासिल किए थे। निचले क्रम में बल्लेबाजी करते हुए उन्होंने 89 रन भी बनाए थे। इस प्रदर्शन के बाद उन्हें भारतीय क्रिकेट के भविष्य के अहम खिलाड़ियों में गिना जाने लगा। उनकी उपयोगिता यह थी कि वह जरूरत के मुताबिक बल्लेबाजी के साथ गेंदबाजी और फील्डिंग में भी योगदान दे सकते थे। हालांकि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उस शुरुआती सफलता को वह लंबे समय तक बरकरार नहीं रख सके।
विजय भारद्वाज ने सितंबर 1999 में भारत के लिए वनडे डेब्यू किया और इसके बाद टेस्ट क्रिकेट में भी मौका मिला। उनका अंतरराष्ट्रीय करियर कुल तीन टेस्ट और 10 वनडे तक ही सीमित रहा। तीन टेस्ट की तीन पारियों में उन्होंने 28 रन बनाए और एक विकेट लिया। वहीं 10 वनडे में उन्होंने 136 रन बनाने के साथ 16 विकेट अपने नाम किए। उनका आखिरी वनडे मुकाबला 2002 में जिम्बाब्वे के खिलाफ रहा। इसके बाद उनकी भारतीय टीम में वापसी नहीं हो सकी।
लेकिन अगर विजय भारद्वाज के पूरे क्रिकेट करियर को केवल भारत के लिए खेले 13 मुकाबलों के आधार पर देखा जाए तो उनकी कहानी अधूरी रह जाएगी। कर्नाटक के लिए उनका घरेलू क्रिकेट करियर बेहद प्रभावशाली रहा। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उन्होंने 96 मैचों की 149 पारियों में 5553 रन बनाए। इस दौरान उनके बल्ले से 14 शतक और 26 अर्धशतक निकले। गेंदबाजी में भी उन्होंने 59 विकेट हासिल किए। लिस्ट ए क्रिकेट में उनके नाम 1707 रन और 46 विकेट दर्ज हैं।
कर्नाटक के मजबूत दौर में भारद्वाज टीम का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। वह 1990 के दशक में कर्नाटक की तीन रणजी ट्रॉफी खिताबी जीत का हिस्सा रहे। 2000 से 2002 तक उन्होंने कर्नाटक की कप्तानी भी की। घरेलू क्रिकेट में उनके लगातार प्रदर्शन ने साबित किया कि वह सिर्फ एक सीरीज के खिलाड़ी नहीं थे बल्कि लंबे समय तक उच्च स्तर पर प्रदर्शन करने की क्षमता रखते थे। उनके करियर पर चोटों और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का भी असर पड़ा और यही वजह रही कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनका सफर अपेक्षा के मुताबिक आगे नहीं बढ़ सका।
4 नवंबर 2006 को विजय भारद्वाज ने क्रिकेट के सभी प्रारूपों से संन्यास ले लिया। इसके बाद उन्होंने खेल से दूरी बनाने के बजाय कोचिंग और कमेंट्री को अपना नया रास्ता बनाया। वह नेशनल क्रिकेट एकेडमी से लेवल थ्री कोच के रूप में प्रमाणित हैं। आईपीएल के शुरुआती दौर में वह रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के सहायक कोच भी रहे। इसके अलावा ओमान क्रिकेट टीम के फील्डिंग कोच के रूप में भी काम किया। बाद के वर्षों में उन्होंने कन्नड़ क्रिकेट कमेंट्री और विश्लेषण के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।
विजय भारद्वाज की कहानी यही बताती है कि किसी खिलाड़ी के करियर को केवल अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों से नहीं आंका जा सकता। भारत के लिए उनका सफर भले ही छोटा रहा लेकिन कर्नाटक क्रिकेट में उनका योगदान और बाद में कोचिंग व कमेंट्री के जरिए खेल से जुड़ाव उनकी क्रिकेट विरासत को आज भी खास बनाता है।
