इस स्पर्धा का स्वर्ण पदक ग्रेनाडा के लिंडन विक्टर ने 8096 अंकों के साथ जीता, जबकि कनाडा के अनुभवी एथलीट डेमियन वार्नर 8036 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर रहे। तेजस्विन शंकर ने दोनों दिग्गज खिलाड़ियों के बीच शानदार प्रदर्शन करते हुए तीसरा स्थान हासिल किया और भारत के लिए ऐतिहासिक कांस्य पदक सुनिश्चित किया।
तेजस्विन की शुरुआत 100 मीटर दौड़ में सातवें स्थान से हुई थी, लेकिन इसके बाद उन्होंने शानदार वापसी की। लंबी कूद में दूसरे स्थान पर रहते हुए उन्होंने अंकतालिका में सुधार किया। हाई जंप में 2.15 मीटर की शानदार छलांग लगाकर पहला स्थान हासिल किया और कुल रैंकिंग में दूसरे स्थान पर पहुंच गए। पहले दिन के अंत तक उन्होंने खुद को पदक की दौड़ में मजबूती से बनाए रखा।
दूसरे दिन भी तेजस्विन ने दमदार प्रदर्शन जारी रखा। 110 मीटर बाधा दौड़ और डिस्कस थ्रो में उन्होंने दूसरा स्थान हासिल किया। हालांकि पोल वॉल्ट और भाला फेंक में उन्हें उम्मीद के मुताबिक अंक नहीं मिले, जिससे वह तीसरे स्थान पर खिसक गए। इसके बावजूद अंतिम इवेंट 1500 मीटर दौड़ में उन्होंने संयम बनाए रखा और कुल 7976 अंक के साथ कांस्य पदक जीतकर भारतीय खेल इतिहास में अपना नाम दर्ज करा दिया।
डेकाथलॉन को एथलेटिक्स की सबसे कठिन स्पर्धाओं में से एक माना जाता है। यह प्रतियोगिता दो दिनों तक चलती है और इसमें कुल 10 अलग-अलग इवेंट शामिल होते हैं। पहले दिन खिलाड़ियों को 100 मीटर दौड़, लंबी कूद, शॉटपुट, हाई जंप और 400 मीटर दौड़ में हिस्सा लेना होता है। दूसरे दिन 110 मीटर बाधा दौड़, डिस्कस थ्रो, पोल वॉल्ट, भाला फेंक और 1500 मीटर दौड़ आयोजित की जाती है। हर स्पर्धा में प्रदर्शन के आधार पर अंक दिए जाते हैं और अंत में सभी 10 इवेंट्स के अंकों को जोड़कर अंतिम परिणाम तय किया जाता है।
समय आधारित प्रतियोगिताओं जैसे 100 मीटर, 400 मीटर और 1500 मीटर में कम समय लेने वाले खिलाड़ी को अधिक अंक मिलते हैं। वहीं लंबी कूद, हाई जंप, पोल वॉल्ट, शॉटपुट, डिस्कस और भाला फेंक जैसी फील्ड स्पर्धाओं में जितनी अधिक दूरी या ऊंचाई हासिल होती है, उतने अधिक अंक दिए जाते हैं। इसके लिए विश्व एथलेटिक्स द्वारा निर्धारित आधिकारिक स्कोरिंग प्रणाली लागू होती है।
तेजस्विन शंकर का यह कांस्य पदक केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं बल्कि भारतीय एथलेटिक्स के लिए मील का पत्थर है। लगातार दो दिनों तक दस अलग-अलग स्पर्धाओं में उच्च स्तर का प्रदर्शन करना किसी भी खिलाड़ी के लिए आसान नहीं होता। ऐसे में इस कठिन प्रतियोगिता में भारत का पहला पदक जीतकर तेजस्विन ने साबित कर दिया कि भारतीय खिलाड़ी अब बहु-इवेंट एथलेटिक्स में भी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को चुनौती देने की क्षमता रखते हैं। उनकी यह ऐतिहासिक सफलता आने वाली पीढ़ी के एथलीटों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी और भारतीय एथलेटिक्स के भविष्य को नई दिशा देगी।
