नई दिल्ली। भारत के मिसाइल कार्यक्रम में पृथ्वी मिसाइल परिवार की भूमिका बेहद अहम रही है। इसे केवल एक हथियार के तौर पर नहीं, बल्कि देश में स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक विकसित करने की दिशा में एक बड़े कदम के रूप में देखा जाता है। इसी कार्यक्रम से आगे चलकर भारत ने अग्नि समेत कई आधुनिक मिसाइल प्रणालियों के विकास का रास्ता तैयार किया।
भारत के पड़ोसी चीन और पाकिस्तान के लिए भी पृथ्वी का विकास रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण घटनाक्रम था। हालांकि, समय के साथ इसके अलग-अलग संस्करणों में बदलाव हुए और भारतीय मिसाइल तकनीक कहीं अधिक उन्नत स्तर तक पहुंच गई।
1983 में शुरू हुआ मिसाइल आत्मनिर्भरता का सफर
पृथ्वी की कहानी 1983 में शुरू हुए इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IGMDP) से जुड़ी है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य भारत को विभिन्न तरह की मिसाइल तकनीकों में आत्मनिर्भर बनाना था।
उस दौर में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अत्याधुनिक मिसाइल तकनीक और उससे जुड़ी प्रणालियों को देश में विकसित करना थी। IGMDP ने इसी दिशा में काम को संस्थागत रूप दिया।
इस कार्यक्रम के तहत अलग-अलग श्रेणी की मिसाइलों के विकास पर काम शुरू हुआ। पृथ्वी इसी महत्वाकांक्षी कार्यक्रम की शुरुआती सफलताओं में शामिल रही।
पृथ्वी ने दिखाई स्वदेशी तकनीक की ताकत
पृथ्वी के विकास ने भारत को बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण अनुभव दिया। मिसाइल के साथ-साथ उसके मार्गदर्शन, नियंत्रण, प्रणोदन और परीक्षण से जुड़ी तकनीकों पर भी देश की क्षमता विकसित हुई।
यही तकनीकी आधार आगे के मिसाइल कार्यक्रमों के लिए उपयोगी साबित हुआ। भारत ने इसके बाद लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों से लेकर सतह से हवा में मार करने वाली प्रणालियों और क्रूज मिसाइलों तक अपनी क्षमताओं का विस्तार किया।
पृथ्वी परिवार में आए कई संस्करण
समय के साथ पृथ्वी परिवार में अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से कई संस्करण विकसित किए गए। इनमें सेना और वायुसेना के लिए विकसित प्रणालियां शामिल रहीं।
पृथ्वी की शुरुआती प्रणालियों का इस्तेमाल सामरिक जरूरतों के लिए किया गया। इसके बाद भारतीय मिसाइल कार्यक्रम का फोकस अधिक लंबी दूरी, बेहतर सटीकता और आधुनिक मार्गदर्शन प्रणालियों की ओर बढ़ता गया।
यानी पृथ्वी को भारत की मिसाइल यात्रा की अंतिम मंजिल के बजाय एक महत्वपूर्ण शुरुआती पड़ाव माना जाना ज्यादा उचित है।
पृथ्वी के बाद अग्नि ने बढ़ाई पहुंच
IGMDP के तहत पृथ्वी के अलावा अग्नि, आकाश और त्रिशूल जैसी मिसाइल प्रणालियों पर भी काम हुआ। इनमें अग्नि श्रृंखला ने भारत की लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को नई दिशा दी।
बाद के वर्षों में भारत ने ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और कई अन्य अत्याधुनिक प्रणालियां विकसित कीं। इससे स्पष्ट होता है कि शुरुआती स्वदेशी कार्यक्रमों से हासिल तकनीकी अनुभव ने देश के व्यापक मिसाइल इकोसिस्टम को मजबूत करने में योगदान दिया।
अब नई पीढ़ी की मिसाइलों का दौर
आज भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) का जोर पहले की तुलना में ज्यादा उन्नत, सटीक और आधुनिक मिसाइल प्रणालियों पर है। नई पीढ़ी की मिसाइलों में बेहतर नेविगेशन, सटीकता, गतिशीलता और आधुनिक सेंसर जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
इस लिहाज से पृथ्वी का महत्व सिर्फ उसकी मारक क्षमता में नहीं, बल्कि उस तकनीकी नींव में है जिसने भारत को आगे की मिसाइल तकनीक विकसित करने का आत्मविश्वास दिया।
पृथ्वी से शुरू होकर लंबा हुआ सफर
भारत के मिसाइल कार्यक्रम को अगर एक लंबी यात्रा के तौर पर देखें तो पृथ्वी उस यात्रा के शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण पड़ावों में से एक थी। इसके बाद अग्नि, आकाश, ब्रह्मोस और अन्य प्रणालियों ने भारतीय रक्षा तकनीक को लगातार आगे बढ़ाया।
इसलिए पृथ्वी को भारत का पहला स्वदेशी ‘ब्रह्मास्त्र’ कहना भले ही एक रूपक हो, लेकिन देश की मिसाइल आत्मनिर्भरता की कहानी में इसका स्थान निश्चित तौर पर ऐतिहासिक है।
