वैश्विक स्तर पर ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव ने ऊर्जा बाजारों को सबसे अधिक प्रभावित किया है। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग को लेकर उठ रहे विवादों ने अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति पर चिंता बढ़ा दी है। इसी अनिश्चितता के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका भी गहरा रही है। ऊर्जा कीमतों में यह अस्थिरता सीधे तौर पर भारतीय बाजारों पर भी असर डाल रही है, क्योंकि भारत अपनी बड़ी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है।
इसी बीच विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली ने भी बाजार की धारणा को कमजोर किया है। लगातार हो रही निकासी ने घरेलू बाजार में तरलता और विश्वास दोनों पर दबाव बनाया है। निवेशक फिलहाल सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे इक्विटी बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक विदेशी निवेशकों की रणनीति में स्थिरता नहीं आती, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।
घरेलू स्तर पर आने वाले आर्थिक आंकड़े भी बाजार की दिशा को प्रभावित करने वाले हैं। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर की गतिविधियों से जुड़े संकेतक निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे। इसके अलावा बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े आंकड़े, क्रेडिट ग्रोथ और विदेशी मुद्रा भंडार जैसी जानकारियां भी बाजार की धारणा को प्रभावित करेंगी। इन आंकड़ों के आधार पर यह तय होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक दबावों के बीच कितनी मजबूती से खड़ी है।
बीते सप्ताह बाजार में गिरावट का रुख देखने को मिला, जहां प्रमुख सूचकांक दबाव में रहे। कई सेक्टर्स में बिकवाली हावी रही, विशेषकर रियल्टी, आईटी और ऑटो जैसे क्षेत्रों में कमजोरी देखने को मिली। हालांकि कुछ क्षेत्रों जैसे फार्मा और मेटल में अपेक्षाकृत स्थिरता बनी रही, लेकिन समग्र रूप से बाजार नकारात्मक रुझान में बंद हुआ।
