मामला एक ऐसे दंपती से जुड़ा है, जिनकी शादी ऑनलाइन मैट्रिमोनियल वेबसाइट के माध्यम से हुई थी। विवाह के कुछ समय बाद दोनों के बीच मतभेद शुरू हो गए। पत्नी का आरोप था कि पति उसके रंग को लेकर टिप्पणी करता था और उसके व्यक्तित्व, कम IQ तथा बातचीत करने के तरीके का मजाक उड़ाता था। विवाद बढ़ने के बाद पति ने उसे अलग रहने के लिए कहा।
इसके बाद पत्नी पहले बेंगलुरु में अपनी छोटी बहन के पास रहने लगी और बाद में कोलकाता में अपनी बड़ी बहन के पास चली गई। इसी दौरान पति ने रांची की फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दाखिल की। वैवाहिक संबंधों में बढ़ते विवाद के बीच पत्नी ने भी पति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की।
पत्नी ने धारा 498A के तहत क्रूरता का आरोप लगाने के अलावा करीब 35 लाख रुपये के स्त्रीधन को वापस नहीं करने की शिकायत भी की। उसका कहना था कि पति ने वैवाहिक जीवन जारी रखने में भी बाधा डाली। दूसरी ओर, पति ने अपने बचाव में पत्नी पर एक बीमारी से संबंधित आरोप लगाया और कहा कि विवाद के कारण परिस्थितियां खराब हुईं।
11 जून 2024 को रांची की निचली अदालत ने शिकायत और उपलब्ध सामग्री के आधार पर पति को समन जारी किया। इसके बाद पति ने इस कार्रवाई को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी और आपराधिक कार्यवाही समाप्त करने की मांग की।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी की पीठ ने की। अदालत ने धारा 498A में परिभाषित क्रूरता की कानूनी कसौटी पर आरोपों को परखा। कोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान के तहत ऐसे जानबूझकर किए गए व्यवहार को देखा जाता है, जिससे महिला आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो सकती हो या उसके जीवन, शरीर अथवा स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता हो। इसके अलावा गैरकानूनी संपत्ति या दहेज की मांग से जुड़ा उत्पीड़न भी इस प्रावधान के दायरे में आता है।
अदालत ने पाया कि शिकायत में पति की ओर से किसी गैरकानूनी संपत्ति या दहेज की मांग का आरोप नहीं था। साथ ही ऐसे व्यवहार का स्पष्ट आरोप भी नहीं था, जिससे पत्नी को आत्महत्या के लिए मजबूर होने या गंभीर शारीरिक अथवा स्वास्थ्य संबंधी खतरे का सामना करना पड़ा हो।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी के रंग, IQ और बातचीत करने की क्षमता पर टिप्पणी करना अपने आप में उचित व्यवहार नहीं माना जा सकता। हालांकि, केवल इन आरोपों को धारा 498A के तहत आपराधिक क्रूरता मानने के लिए कानून में निर्धारित आवश्यक तत्वों का पूरा होना जरूरी है।
अदालत ने कहा कि आरोपों को पूरी तरह सही मान लेने के बाद भी इस मामले में धारा 498A के तहत अपराध स्थापित नहीं होता। ऐसे में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत का समन आदेश और पति के खिलाफ संबंधित आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
फैसले का मुख्य संदेश यह है कि वैवाहिक जीवन में अपमानजनक व्यवहार और आपराधिक क्रूरता के बीच कानूनी अंतर होता है। हर वैवाहिक विवाद या ताने को स्वतः धारा 498A के अपराध के रूप में नहीं देखा जा सकता। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि पति-पत्नी के बीच अपमानजनक या असम्मानजनक व्यवहार उचित है। अदालत ने इस मामले में केवल यह तय किया कि उपलब्ध आरोप धारा 498A की कानूनी कसौटी पर आपराधिक कार्यवाही जारी रखने के लिए पर्याप्त हैं या नहीं।
