यह दल-बदल ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं। महीष बाथानी क्षेत्र में रविवार को आयोजित कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में तृणमूल समर्थकों ने कांग्रेस का दामन थामा। इस दौरान कांग्रेस के जिला और प्रदेश स्तर के नेता तथा एक पूर्व विधायक भी मौजूद रहे।
महीष बाथानी क्षेत्र को पहले कांग्रेस का मजबूत इलाका माना जाता था। हालांकि, ममता बनर्जी के राजनीतिक प्रभाव के बढ़ने के बाद यहां तृणमूल कांग्रेस का प्रभाव मजबूत हुआ। अब बड़ी संख्या में तृणमूल नेताओं और कार्यकर्ताओं के कांग्रेस में जाने से क्षेत्र में राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
तृणमूल कांग्रेस छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने वाले शराफत अली ने कहा कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में भाजपा के खिलाफ लड़ाई के लिए कांग्रेस के साथ आना जरूरी है। उन्होंने क्षेत्रीय दल के तौर पर तृणमूल की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए और कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ संघर्ष करने की बात कही।
पश्चिम बंगाल में 6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजीनगर सीटों पर उपचुनाव होना है, जबकि मतगणना 9 अक्टूबर को होगी। नंदीग्राम सीट मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के सीट छोड़ने के बाद खाली हुई है। दूसरी ओर रेजीनगर सीट आम जनता उन्नयन पार्टी के हुमायूं कबीर के नौदा सीट बरकरार रखने के कारण खाली हुई। रेजीनगर से उनके बेटे चुनाव मैदान में हैं।
ममता बनर्जी के गुट ने रेजीनगर से रबीउल आलम चौधरी को उम्मीदवार बनाया है। वहीं, नंदीग्राम को लेकर भी राजनीतिक गतिविधियां तेज रही हैं। ममता बनर्जी के गुट की ओर से यह सीट कांग्रेस के लिए छोड़ने की पेशकश किए जाने की बात सामने आई थी, जबकि रेजीनगर में समर्थन मांगे जाने का भी जिक्र हुआ। कांग्रेस ने दोनों सीटों पर समर्थन देने की मांग को स्वीकार नहीं किया।
नंदीग्राम सीट पर ममता गुट के उम्मीदवार के तौर पर नामित संचिता प्रधान डे ने नाम वापस ले लिया है। इसके चलते इस सीट पर ममता गुट के पास फिलहाल कोई उम्मीदवार नहीं है।
इसी बीच तृणमूल कांग्रेस के मूल नाम और चुनाव चिह्न को लेकर भी मामला चल रहा है। चुनाव आयोग ने तृणमूल नाम और ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न को फ्रीज किया हुआ है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को अंतिम फैसला लेने के लिए समयसीमा तय की है।
अदालत ने संबंधित पक्षों को हलफनामे और अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। इसके बाद चुनाव आयोग को तीन महीने के भीतर नाम और चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद पर फैसला लेने को कहा गया है। सुनवाई के दौरान आयोग की ओर से समय लगने की दलील दी गई, जिस पर अदालत ने निर्धारित अवधि में फैसला लेने को कहा। अदालत ने इस प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद लेने का सुझाव भी दिया है।
