सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्तियों के निर्णयों और राजनीतिक कदमों पर समाज में चर्चा और आलोचना स्वाभाविक प्रक्रिया है। अदालत ने ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए यह भी संकेत दिया कि पहले भी कार्टून और व्यंग्य के माध्यम से राजनीतिक व्यक्तित्वों पर टिप्पणी होती रही है और यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा रहा है।
मामला तब सामने आया जब राघव चड्ढा ने सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रसारित कथित एआई-जनरेटेड डीपफेक वीडियो, छेड़छाड़ किए गए भाषणों और भ्रामक सामग्री को हटाने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। याचिका में यह दावा किया गया था कि ऐसी सामग्री उनके व्यक्तिगत अधिकारों और छवि को प्रभावित कर रही है।
हालांकि अदालत ने सुनवाई के दौरान यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी विशेष वीडियो या सामग्री को लेकर आपत्ति है, तो उसके लिए अलग और विशिष्ट याचिका दायर की जानी चाहिए। व्यापक रूप से सभी सामग्री पर रोक लगाने की मांग को न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
इस टिप्पणी के बाद कानूनी हलकों में यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तित्व अधिकारों के बीच संतुलन के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल युग में एआई आधारित सामग्री और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच ऐसे मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
गौरतलब है कि राघव चड्ढा ने हाल ही में राजनीतिक बदलाव करते हुए एक नई पार्टी में शामिल होने का निर्णय लिया था, जिसके बाद उन पर सोशल मीडिया पर विभिन्न प्रकार की टिप्पणियां और सामग्री सामने आई थी। इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने अदालत का रुख किया था।
