कुछ ही दिनों में बदला माहौल
29 अप्रैल को हुए दूसरे चरण के मतदान के दौरान फलता क्षेत्र में हर तरफ तृणमूल कांग्रेस के झंडे और कार्यकर्ता नजर आ रहे थे। लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। क्षेत्र में अन्य राजनीतिक दलों के झंडे दिखाई दे रहे हैं, जबकि टीएमसी की मौजूदगी काफी कमजोर बताई जा रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार, जहांगीर खान ने चुनावी मुकाबले से खुद को अलग कर लिया है और उसके बाद से वह सार्वजनिक रूप से भी नजर नहीं आए। बताया जा रहा है कि मतदान के दिन भी वह क्षेत्र में मौजूद नहीं थे।
अभिषेक बनर्जी के करीबी माने जाते थे जहांगीर
जहांगीर खान को डायमंड हार्बर सांसद अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता रहा है। लोकसभा चुनाव 2024 में इस इलाके में टीएमसी को भारी समर्थन मिला था। हालांकि, खान के चुनाव से हटने के बाद पार्टी ने इसे उनका निजी फैसला बताया।
पुनर्मतदान में 86 फीसदी से ज्यादा वोटिंग
गुरुवार को सीट पर दोबारा मतदान कराया गया, जिसमें 86 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज किया गया। चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए केंद्रीय बलों की भारी तैनाती की गई थी। दरअसल, 29 अप्रैल को हुए मतदान के दौरान कुछ मतदान केंद्रों पर ईवीएम से छेड़छाड़ और मशीनों पर इत्र जैसे पदार्थ तथा टेप लगाए जाने की शिकायतें सामने आई थीं, जिसके बाद पुनर्मतदान का फैसला लिया गया।
भाजपा और वाम मोर्चे के बीच सीधी टक्कर
जहांगीर खान के चुनावी मैदान से हटने के बाद टीएमसी की स्थिति कमजोर मानी जा रही है। अब इस सीट पर मुकाबला मुख्य रूप से भाजपा उम्मीदवार देबांग्शु पांडा और माकपा प्रत्याशी शंभूनाथ कुर्मी के बीच माना जा रहा है। वहीं कांग्रेस की ओर से अब्दुर रज्जाक मोल्ला मैदान में हैं।
भवानीपुर के बाद एक और चुनौत
इससे पहले भवानीपुर सीट पर भी तृणमूल कांग्रेस को झटका लगा था। ममता बनर्जी को वहां शुभेंदु अधिकारी ने बड़े अंतर से हराया था। इससे पहले 2021 विधानसभा चुनाव में भी ममता को नंदीग्राम सीट पर हार का सामना करना पड़ा था। अब फलता में बदलते हालात टीएमसी के लिए नई राजनीतिक चुनौती बनते दिख रहे हैं।
