सूत्रों के अनुसार, सरकार का उद्देश्य प्रशासनिक कामकाज को अधिक गति देना और विभागों में निर्णय प्रक्रिया को तेज करना है। इसी को ध्यान में रखते हुए उन विभागों में जहां कैबिनेट मंत्रियों के साथ राज्यमंत्री कार्यरत हैं, वहां राज्यमंत्रियों को और अधिक स्वतंत्र जिम्मेदारियां देने की योजना पर चर्चा हुई है। माना जा रहा है कि इससे विभागीय कामकाज में न केवल तेजी आएगी बल्कि फाइलों के निपटारे में भी सुधार देखने को मिलेगा।
बताया जा रहा है कि जिन राज्यमंत्रियों को अब तक सीमित कार्य या केवल समन्वय की भूमिका दी गई थी, उन्हें अब कुछ अतिरिक्त प्रशासनिक अधिकार दिए जा सकते हैं। इनमें विभागीय निर्णयों में भागीदारी, योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी और कुछ स्तर तक स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति शामिल हो सकती है। इससे राज्यमंत्रियों की भूमिका केवल औपचारिक न रहकर अधिक सक्रिय और प्रभावशाली हो जाएगी।
सूत्र यह भी बताते हैं कि स्वास्थ्य, नगरीय प्रशासन और पंचायत जैसे महत्वपूर्ण विभागों में कार्यरत राज्यमंत्रियों को इस बदलाव का अधिक लाभ मिल सकता है। इन विभागों में काम का दायरा बड़ा होने के कारण प्रशासनिक दबाव भी अधिक रहता है, ऐसे में अतिरिक्त जिम्मेदारियां मिलने से कार्यों के बेहतर संचालन की उम्मीद की जा रही है।
वर्तमान व्यवस्था में कई राज्यमंत्रियों के पास केवल सीमित कार्यों की जिम्मेदारी है, जबकि कुछ को केवल कर्मचारी स्तर के तबादलों या छोटे प्रशासनिक निर्णयों तक ही सीमित रखा गया है। नए प्रस्ताव के तहत इस संरचना में बदलाव कर उन्हें विभागीय कार्यप्रणाली में अधिक सक्रिय भूमिका देने की तैयारी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम सरकार की उस रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जिसके तहत प्रशासनिक ढांचे को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इससे जहां एक ओर विभागीय कामकाज में तेजी आएगी, वहीं दूसरी ओर मंत्रियों और राज्यमंत्रियों के बीच जिम्मेदारियों का बेहतर संतुलन भी स्थापित हो सकेगा।
हालांकि अभी इस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय लिया जाना बाकी है, लेकिन चर्चा के स्तर पर इसे काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि इसे लागू किया जाता है तो मध्यप्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था में यह एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है, जिससे सरकार की कार्यप्रणाली और अधिक गतिशील और परिणामोन्मुख बन सकती है।
