पाकिस्तान के साथ संभावित राजनीतिक रास्ते को लेकर भी कोशिशें की गईं लेकिन यह योजना सफल नहीं हो सकी। दूसरी ओर स्वतंत्र रियासत के रूप में भोपाल का अस्तित्व बनाए रखना भी लगातार मुश्किल होता जा रहा था। ऐसे राजनीतिक दबाव के बीच आखिरकार 14 अगस्त 1947 की रात करीब 8 बजकर 15 मिनट पर नवाब हमीदुल्ला खान ने भारतीय संघ में शामिल होने के लिए इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर कर दिए। इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर होते ही संवैधानिक रूप से भोपाल भारत का हिस्सा बन गया।
हालांकि यह पूर्ण विलय नहीं था। इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन के तहत भोपाल ने रक्षा विदेश मामले और संचार जैसे महत्वपूर्ण विषय भारत सरकार को सौंपे थे जबकि आंतरिक प्रशासन कानून व्यवस्था और शासन की जिम्मेदारी नवाब के पास ही बनी रही। यानी संवैधानिक स्तर पर भोपाल भारत से जुड़ चुका था लेकिन रियासत के भीतर नवाबशाही का प्रभाव तत्काल खत्म नहीं हुआ था।
इस फैसले को लेकर एक दिलचस्प पहलू यह भी था कि नवाब ने हस्ताक्षर करने के बाद तत्काल इसकी सार्वजनिक घोषणा नहीं करने का अनुरोध किया। उन्होंने गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन से करीब 10 दिन तक इस फैसले को गोपनीय रखने की इच्छा जताई। माउंटबेटन ने उनकी बात स्वीकार कर ली थी। हालांकि यह खबर लंबे समय तक छिपी नहीं रह सकी। भारत सरकार के स्टेट्स डिपार्टमेंट के सचिव वीपी मेनन इस पूरी प्रक्रिया से परिचित थे। बाद में उन्होंने अपनी पुस्तक द स्टोरी ऑफ द इंटिग्रेशन ऑफ द इंडियन स्टेट्स में रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया का विस्तार से उल्लेख किया।
भोपाल के इतिहास का सबसे दिलचस्प विरोधाभास यह था कि जिस समय महल के भीतर भारत से जुड़ने का ऐतिहासिक फैसला हो चुका था उसी समय शहर की सड़कों पर आजादी का जश्न मनाने की तैयारियां चल रही थीं। 15 अगस्त 1947 की सुबह भोपाल में सार्वजनिक अवकाश था। यादगार ए शाहजहानी पार्क में पंडित चतुरनारायण मालवीय की अध्यक्षता में प्रजामंडल की बड़ी सभा आयोजित हुई। आम लोग देश की आजादी का उत्सव मना रहे थे लेकिन उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि एक रात पहले ही भोपाल के भविष्य को लेकर बड़ा संवैधानिक फैसला हो चुका है।
इसके बाद 16 अगस्त को लॉर्ड माउंटबेटन ने भी भोपाल के इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन को मंजूरी दे दी। इस तरह भोपाल का भारत से संवैधानिक संबंध और मजबूत हुआ। हालांकि पूर्ण राजनीतिक एकीकरण की प्रक्रिया बाद में आगे बढ़ी और अंततः भोपाल रियासत का भारतीय संघ में पूरा विलय हुआ।
भोपाल के भारत में शामिल होने की यह कहानी सिर्फ एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर की कहानी नहीं है बल्कि यह उस दौर के बदलते राजनीतिक समीकरणों स्वतंत्र रियासतों की चिंताओं और आजाद भारत के निर्माण की जटिल प्रक्रिया को भी सामने लाती है। 14 अगस्त 1947 की वह रात भोपाल के इतिहास में इसलिए खास बन गई क्योंकि उसी रात एक रियासत ने बदलते समय की वास्तविकता को स्वीकार करते हुए भारत के साथ अपने संवैधानिक रिश्ते की शुरुआत की।
