ट्रंप का ‘ट्रुथ सोशल’ धमाका: “मुझे यह बिल्कुल मंजूर नहीं!”
सोमवार रात डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ईरान के प्रस्ताव की धज्जियां उड़ाते हुए लिखा। “मैंने ईरान के तथाकथित प्रतिनिधियों का जवाब पढ़ा है। मुझे यह जरा भी पसंद नहीं आया बिल्कुल भी मंजूर नहीं!”
ट्रंप के इस कड़े तेवर के बाद उनके करीबी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने भी आग में घी डालने का काम किया है। उन्होंने संकेत दिया कि अब बातचीत का समय खत्म हो चुका है और ‘प्रोजेक्ट फ़्रीडम प्लस’ (सैन्य विकल्प) ही एकमात्र रास्ता बचा है।
ईरान की ‘रेड लाइन’: वो शर्तें जिन पर भड़का अमेरिका
लेबनानी नेटवर्क ‘अल-मयादीन’ के अनुसार, ईरान ने समझौते के बदले जो मांगें रखी हैं, वे अमेरिका के लिए किसी ‘सरेंडर’ से कम नहीं थीं:
आर्थिक घेराबंदी का अंत: ईरान ने मांग की है कि उसके तेल निर्यात पर लगी रोक तुरंत हटाई जाए।
फ्रीज फंड की रिहाई: विदेशों में जप्त ईरान की अरबों डॉलर की संपत्ति को तत्काल मुक्त किया जाए।
होर्मुज पर कब्ज़ा: दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ पर ईरान का पूर्ण नियंत्रण हो।
लेबनान युद्धविराम: ईरान ने इसे अपनी ‘रेड लाइन’ घोषित किया है।
परमाणु दांव: क्या यह ईरान की चाल है?
दिलचस्प बात यह है कि ईरान ने पहली बार ‘लचीलापन’ दिखाते हुए 30 दिनों के भीतर परमाणु मुद्दे पर चर्चा करने की बात कही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह युद्ध टालने या वक्त हासिल करने की एक सोची-झीली रणनीति हो सकती है।
दूसरी ओर, अमेरिका की मांग बेहद सख्त है: “ईरान अपना 60% शुद्ध यूरेनियम सौंप दे, परमाणु प्लांट नष्ट करे और अगले 20 साल तक संवर्धन भूल जाए।”
ईरान का पलटवार: “हम ट्रंप को खुश करने के लिए नहीं बैठे”
तेहरान ने भी साफ कर दिया है कि वह दबाव में नहीं झुकेगा। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने कहा कि ईरान ट्रंप को खुश करने के लिए अपनी नीतियां नहीं बनाता। सरकारी मीडिया ने तो यहां तक कह दिया कि ट्रंप की मांगें “बेतुकी” हैं और ईरान उनके आगे घुटने नहीं टेकेगा।
युद्ध या कूटनीति?
दुनिया के सामने अब तीन ही रास्ते बचे हैं:इजरायल के साथ मिलकर अमेरिका ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला करे। युद्ध के बिना ईरान का दम घोंटने के लिए समुद्र में उसकी घेराबंदी और सख्त की जाए। ट्रंप अपनी ‘आर्ट ऑफ द डील’ का इस्तेमाल कर ईरान से कोई ऐसी बड़ी रियायत छीन लें जो अब तक असंभव मानी जाती थी।अगर तनाव कम नहीं हुआ, तो वैश्विक तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिसका असर भारत समेत पूरी दुनिया की जेब पर पड़ेगा।
