विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा से यह संकेत मिला कि व्यापार, तकनीक और रणनीतिक मुद्दों पर अमेरिका चीन पर निर्णायक दबाव बनाने में अभी तक पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है। वहीं शी जिनपिंग ने “थ्यूसीडाइड्स ट्रैप” का जिक्र कर यह संकेत देने की कोशिश की कि चीन खुद को अब उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में देखता है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार यह भी मानते हैं कि अमेरिका का प्रभाव तुरंत खत्म होने वाला नहीं है। अमेरिका अब भी सैन्य, तकनीकी और वित्तीय रूप से दुनिया की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में बना हुआ है, जबकि चीन को भी आर्थिक सुस्ती, सप्लाई चेन और जनसंख्या गिरावट जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
इस पूरे बदलते समीकरण में भारत की भूमिका को बेहद अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत आने वाले दशकों में अमेरिका और चीन के बीच संतुलन साधने वाली बड़ी शक्ति बन सकता है। यूरोप, रूस और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के साथ भारत के संबंध भी आने वाले समय में उसकी रणनीतिक स्थिति तय करेंगे।
विदेश नीति विश्लेषकों के अनुसार, भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह अमेरिका और चीन दोनों के साथ अपने हितों का संतुलन बनाए रखते हुए आर्थिक और सामरिक रूप से खुद को मजबूत करे।
