अमेरिकी सेना का दावा है कि जिन ठिकानों को निशाना बनाया गया वहां से अमेरिकी सैनिकों और सऊदी अरब के महत्वपूर्ण ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमलों की तैयारी की जा रही थी। सुरक्षा एजेंसियों को मिली खुफिया जानकारी के आधार पर यह संयुक्त कार्रवाई की गई। हमलों के कुछ ही घंटों बाद ईरान की ओर से जवाबी कदम उठाया गया और जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने की दिशा में कई बैलिस्टिक मिसाइलें दागी गईं। हालांकि अमेरिकी रक्षा प्रणाली ने सभी मिसाइलों को लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही हवा में नष्ट कर दिया।
इस घटनाक्रम के बीच व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की महत्वपूर्ण बैठक भी चर्चा का केंद्र रही। बैठक के बाद नेतन्याहू ने कहा कि दोनों देशों के बीच इस बात पर स्पष्ट सहमति बनी है कि ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाएंगे। माना जा रहा है कि यह बैठक मिडिल ईस्ट की भविष्य की रणनीति तय करने के लिहाज से बेहद अहम रही।
इसी दौरान यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने भी ट्रंप से मुलाकात कर एयर डिफेंस सिस्टम रक्षा सहयोग और रूस यूक्रेन युद्ध पर विस्तार से चर्चा की। दूसरी ओर ओमान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के नियंत्रण को लेकर नया प्रस्ताव रखा है जिसमें इस रणनीतिक समुद्री मार्ग का संचालन क्षेत्र के सभी देशों की साझेदारी से करने की बात कही गई है। इस प्रस्ताव को खाड़ी क्षेत्र के कई देशों का समर्थन मिलने की खबर है।
बढ़ते तनाव के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत की खबरों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कुछ नरमी देखने को मिली है। हालांकि सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा हालात और बिगड़ते हैं तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।
उधर यमन के हूती विद्रोहियों की चेतावनी के बाद रेड सी में जहाजों की सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा बन गई है। रिपोर्टों के अनुसार चीन ने अपने तेल टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए हूती प्रतिनिधियों से सीधे संपर्क किया है ताकि समुद्री व्यापार प्रभावित न हो।
संयुक्त राष्ट्र में भी इस पूरे घटनाक्रम पर चिंता जताई गई है। पाकिस्तान ने कहा कि सऊदी अरब को इस संघर्ष में घसीटने की कोशिश हो रही है और सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। वहीं गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल ने सऊदी अरब पर हुए हमलों की कड़ी निंदा करते हुए उसकी सुरक्षा और संप्रभुता के समर्थन का भरोसा दोहराया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं हुए तो यह संघर्ष केवल ईरान और इजरायल तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर असर डाल सकता है।
