भारतीय सिनेमा के इतिहास में साल 1999 एक ऐसा मोड़ था, जब पर्दे पर देशभक्ति को एक नई और यथार्थवादी परिभाषा मिली। उस दौर में जहाँ बॉलीवुड मुख्य रूप से रोमांटिक कहानियों में व्यस्त था, निर्देशक जॉन मैथ्यू माथन एक ऐसी कहानी लेकर आए जिसने न केवल दर्शकों को झकझोर दिया, बल्कि सेंसर बोर्ड के पसीने छुड़ा दिए। फिल्म ‘सरफरोश’ को आज एक क्लासिक का दर्जा प्राप्त है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसकी रिलीज का रास्ता कांटों भरा था। यह पहली बार था जब किसी मुख्यधारा की भारतीय फिल्म ने सीधे तौर पर पड़ोसी देश पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई का नाम लेकर उन्हें भारत में हो रही आतंकवादी घटनाओं का जिम्मेदार ठहराया था। फिल्म की यही निर्भीकता इसके लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गई थी।
उस समय भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक रिश्ते एक नाजुक मोड़ पर थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी शांति की पहल करते हुए दिल्ली से लाहौर के बीच बस सेवा शुरू कर रहे थे। एक तरफ जहाँ सरकार दोस्ती का हाथ बढ़ा रही थी, वहीं दूसरी तरफ ‘सरफरोश’ जैसी फिल्म सेंसर बोर्ड के पास पहुंची जिसमें आतंकवाद को सीधे तौर पर पाकिस्तान से जोड़कर दिखाया गया था। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएसई) के सदस्यों को डर था कि फिल्म के संवाद और चित्रण दोनों देशों के बीच चल रही बातचीत की प्रक्रिया को बिगाड़ सकते हैं। बोर्ड ने फिल्म को सर्टिफिकेट देने से साफ इनकार कर दिया और शर्त रखी कि फिल्म से ‘पाकिस्तान’ और ‘आईएसआई’ जैसे शब्दों को पूरी तरह से हटा दिया जाए।
निर्देशक जॉन मैथ्यू माथन अपनी फिल्म की सच्चाई और रिसर्च को लेकर इतने आश्वस्त थे कि उन्होंने बोर्ड की शर्तों के आगे झुकने से मना कर दिया। जॉन का तर्क था कि फिल्म में जो दिखाया गया है, वह वास्तविकता पर आधारित है और इसे बदलने का मतलब फिल्म की आत्मा को मारना होगा। जब विवाद काफी बढ़ गया और सेंसर बोर्ड अपनी जिद पर अड़ा रहा, तो जॉन ने एक बड़ा कदम उठाते हुए बोर्ड को चेतावनी दी कि वे इस मामले को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे। निर्देशक के इस सख्त तेवर और कानूनी लड़ाई की धमकी के आगे आखिरकार सेंसर बोर्ड को झुकना पड़ा। फिल्म को बिना किसी बड़े बदलाव के पास किया गया और 30 अप्रैल 1999 को यह सिनेमाघरों में रिलीज हुई।
आमिर खान के करियर के लिए ‘सरफरोश’ एक गेम-चेंजर साबित हुई। एसीपी अजय सिंह राठौड़ के किरदार में उन्होंने एक ऐसे पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाई, जो अपने निजी दुख को देश की सेवा के जज्बे में बदल देता है। फिल्म की पटकथा इतनी मजबूत थी कि दर्शक शुरू से अंत तक बंधे रहे। लगभग 8 करोड़ रुपये के सीमित बजट में बनी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया और भारत में करीब 30.37 करोड़ रुपये का ग्रॉस कलेक्शन किया। फिल्म की सफलता केवल व्यावसायिक नहीं थी, बल्कि इसे साल 2000 में ‘बेस्ट पॉपुलर फिल्म प्रोवाइडिंग व्होलसम एंटरटेनमेंट’ की श्रेणी में प्रतिष्ठित नेशनल अवॉर्ड से भी नवाजा गया।
फिल्म की सफलता में इसके संगीत और अन्य कलाकारों का भी बड़ा योगदान था। सोनाली बेंद्रे के साथ आमिर की केमिस्ट्री और जगजीत सिंह की आवाज में सजी गजल ‘होश वालों को खबर क्या’ आज भी लोगों की जुबान पर है। वहीं, नसीरुद्दीन शाह ने पाकिस्तानी गजल गायक और जासूस ‘गुलफाम हसन’ के किरदार में जो जान फूंकी, उसने फिल्म को एक अलग ऊंचाई पर पहुंचा दिया। आज के दौर में जब ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों में आतंकवाद की जड़ें दिखाई जा रही हैं, तब ‘सरफरोश’ की याद आना स्वाभाविक है, क्योंकि यह वह पहली फिल्म थी जिसने कूटनीति की परवाह किए बिना सच बोलने का साहस दिखाया था। 8.1 की आईएमडीबी रेटिंग वाली यह फिल्म आज भी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर सबसे ज्यादा देखी जाने वाली देशभक्ति फिल्मों में से एक है।
