कच्चे तेल की कीमतों में इस तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव माना जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों में तनाव बढ़ने के साथ बाजार में तेल की आपूर्ति को लेकर आशंकाएं मजबूत हुई हैं। अमेरिका की ओर से ईरान के समर्थन वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की चेतावनी ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई है। तेल बाजार में किसी बड़े उत्पादक क्षेत्र से सप्लाई बाधित होने की आशंका पैदा होते ही कीमतों में तेजी देखने को मिलती है। यही स्थिति अभी दिखाई दे रही है।
इस पूरे मामले में हॉर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व बेहद ज्यादा है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। इस रास्ते से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की आवाजाही होती है। अगर क्षेत्र में तनाव बढ़ता है और इस मार्ग से तेल की आवाजाही प्रभावित होती है तो वैश्विक बाजार में सप्लाई को लेकर दबाव और बढ़ सकता है। इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय क्रूड कीमतों पर पड़ सकता है।
भारत के लिए यह चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होता है तो भारतीय तेल कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि घरेलू पेट्रोल और डीजल की कीमत केवल कच्चे तेल के भाव से तय नहीं होती। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स डीलर कमीशन तेल कंपनियों की लागत और मार्जिन तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति जैसे कई कारक शामिल होते हैं। इसलिए क्रूड में तेजी आने के साथ ही अगले दिन पेट्रोल और डीजल महंगा हो जाए ऐसा जरूरी नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है तो क्या होगा। ऐसी स्थिति में घरेलू ईंधन की कीमतों को मौजूदा स्तर पर बनाए रखना तेल कंपनियों और नीति निर्माताओं के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अगर क्रूड की कीमतें और ऊपर जाती हैं तथा रुपया भी डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है तो आयात लागत पर दोहरा दबाव पड़ सकता है। इसका असर पेट्रोल और डीजल के साथ परिवहन लागत पर भी दिखाई दे सकता है।
ईंधन महंगा होने का असर केवल वाहन चलाने वालों तक सीमित नहीं रहता। डीजल की कीमत बढ़ने पर माल ढुलाई और परिवहन लागत बढ़ सकती है। इससे सब्जियों खाद्य सामग्री और अन्य जरूरी सामान की कीमतों पर भी अप्रत्यक्ष दबाव पड़ सकता है। उद्योगों की लागत बढ़ने से महंगाई पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि क्रूड की कीमतें कितने समय तक ऊंचे स्तर पर रहती हैं और सरकार तथा तेल कंपनियां घरेलू कीमतों को लेकर क्या फैसला करती हैं।
फिलहाल सबसे बड़ी निगाह अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तथा मध्य पूर्व से तेल की आपूर्ति पर बनी हुई है। अगर तनाव कम होता है और सप्लाई सामान्य रहती है तो कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आ सकती है। लेकिन अगर आपूर्ति बाधित होने का खतरा बढ़ता है तो क्रूड में और तेजी संभव है। ऐसे में आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल के दाम पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि ईंधन की कीमत निश्चित रूप से बढ़ने वाली है लेकिन महंगे क्रूड ने सस्ते पेट्रोल-डीजल की उम्मीदों के सामने जरूर एक नई चुनौती खड़ी कर दी है।
