नागेश्वरन के अनुसार, पुराने कार्बोरेटर आधारित इंजन E20 में मौजूद अधिक एथेनॉल के साथ हवा और ईंधन के मिश्रण को आधुनिक इंजनों की तरह प्रभावी तरीके से समायोजित नहीं कर पाते। ऐसी स्थिति में इंजन के अधिक गर्म होने और लंबे समय में रबर तथा अन्य संबंधित हिस्सों पर असर पड़ने की आशंका हो सकती है।
मुख्य आर्थिक सलाहकार का सुझाव है कि जब तक पुराने वाहनों को E20 के अनुरूप तकनीकी रूप से अनुकूल नहीं बनाया जाता, तब तक उनके उपयोगकर्ताओं के लिए E10 पेट्रोल का विकल्प उपलब्ध रहना चाहिए। इससे पुराने वाहनों के मालिकों को अपनी जरूरत और वाहन की क्षमता के अनुसार ईंधन चुनने का अवसर मिल सकता है।
भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की नीति का उद्देश्य पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना, विदेशी मुद्रा की बचत करना और किसानों के लिए कृषि उत्पादों का अतिरिक्त बाजार तैयार करना है। एथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने के साथ-साथ मक्का और कुछ अन्य कृषि उत्पादों से किया जाता है। मिश्रण की मात्रा बढ़ने के साथ इन फसलों की मांग पर भी असर पड़ता है।
नागेश्वरन ने एथेनॉल ब्लेंडिंग के खाद्य क्षेत्र पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर भी चिंता जताई है। उनके मुताबिक गन्ने, मक्का और चावल जैसी फसलों का अधिक इस्तेमाल एथेनॉल उत्पादन में होने पर पोल्ट्री और डेयरी उद्योग के लिए उपलब्ध चारे की लागत प्रभावित हो सकती है। इसका असर अंडे, चिकन और दूध जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ने की आशंका है।
चीनी उद्योग पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। गन्ने से बनने वाली चीनी का एक हिस्सा यदि एथेनॉल उत्पादन की ओर जाता है तो भविष्य में चीनी की उपलब्धता और कीमतों पर दबाव की स्थिति बन सकती है। इसी वजह से एथेनॉल नीति को केवल ईंधन की जरूरत के नजरिये से नहीं, बल्कि खाद्य आपूर्ति और कृषि बाजार के व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत बताई जा रही है।
जल संसाधनों को लेकर भी सवाल उठाया गया है। गन्ने की खेती में बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। ऐसे में एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के लिए गन्ने की खेती बढ़ने पर भूजल संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है। नागेश्वरन का कहना है कि एथेनॉल नीति का मूल्यांकन करते समय केवल कारखानों में इस्तेमाल होने वाले पानी का हिसाब पर्याप्त नहीं है। फसल उगाने में इस्तेमाल होने वाले भूजल को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए।
सरकार की ओर से E20 नीति को लगातार समर्थन मिलता रहा है। नीति के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि एथेनॉल मिश्रण बढ़ने से कच्चे तेल के आयात पर होने वाला खर्च कम करने में मदद मिलती है और किसानों को अपनी उपज के लिए अतिरिक्त बाजार मिलता है। वाहनों पर E20 के प्रभाव को लेकर किए गए परीक्षणों में बड़े पैमाने पर इंजन क्षति के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलने की बात भी सामने आई है।
हालांकि E10 और E20 दोनों को समानांतर रूप से उपलब्ध कराने पर भंडारण, परिवहन और वितरण व्यवस्था की अतिरिक्त लागत का मुद्दा उठता है। अलग-अलग मिश्रण वाले पेट्रोल की उपलब्धता के लिए ईंधन आपूर्ति व्यवस्था में अतिरिक्त प्रबंधन की जरूरत पड़ सकती है।
एथेनॉल मिश्रण को लेकर मौजूदा बहस का मूल सवाल यही है कि ऊर्जा सुरक्षा और आयात निर्भरता कम करने के साथ वाहन मालिकों, खाद्य कीमतों, किसानों और जल संसाधनों के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। E30 की दिशा में आगे बढ़ने से पहले इन पहलुओं का व्यापक मूल्यांकन महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वहीं पुराने वाहनों के लिए E10 उपलब्ध रखने का सुझाव मौजूदा नीति में व्यावहारिक विकल्प को लेकर नई चर्चा को जन्म दे रहा है।
