इस पवित्र स्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भगवान शिव के पांच शिवलिंग एक साथ स्थापित हैं। धार्मिक परंपराओं और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में वनवास के दौरान पांडव इस क्षेत्र में आए थे। उन्होंने भगवान शिव की कठिन तपस्या की और पांच अलग-अलग आकारों के शिवलिंगों की स्थापना की। मान्यता है कि युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव ने अपने-अपने कद और स्वभाव के अनुसार इन शिवलिंगों का निर्माण किया था।
गंगेश्वर महादेव मंदिर की एक और अद्वितीय विशेषता इसका भौगोलिक स्थान और प्राकृतिक जलाभिषेक की प्रक्रिया है। जब समुद्र में उच्च ज्वार आता है, तब अरब सागर की उत्तुंग लहरें प्राकृतिक चट्टानों के बीच से बहती हुई सीधे मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचती हैं। ये लहरें पांचों शिवलिंगों का स्पर्श कर उनका प्राकृतिक अभिषेक करती हैं और फिर वापस समुद्र में समा जाती हैं।
ज्वार और भाटा के चक्र के साथ मंदिर का दृश्य बदलता रहता है। भाटा के दौरान जब समुद्र का जलस्तर नीचे चला जाता है, तब पांचों शिवलिंग पूर्णतः स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं। इस दौरान श्रद्धालु आसानी से पूजा-अर्चना कर सकते हैं। मंदिर का यह प्राकृतिक चक्र श्रद्धालुओं के लिए एक अत्यंत आध्यात्मिक और दर्शनीय अनुभव प्रदान करता है।
सावन के पवित्र महीने और महाशिवरात्रि जैसे प्रमुख पर्वों पर यहां देश के विभिन्न राज्यों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्तजन भगवान शिव को जलाभिषेक, बेलपत्र और पुष्प अर्पित कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। लहरों की गर्जना और हर-हर महादेव के उद्घोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है।
भारत में समुद्र तटीय धार्मिक स्थलों का अपना विशेष महत्व रहा है, और मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले श्रद्धालु इस स्थान की प्राकृतिक भव्यता से अभिभूत हो जाते हैं। गंगेश्वर महादेव केवल एक पूजा स्थल नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के नियमों और धार्मिक श्रद्धा के अनोखे तालमेल को भी प्रदर्शित करता है।
दीव आने वाले पर्यटकों के लिए समुद्र की विशालता, तटीय चट्टानों की बनावट और समुद्र जल से स्वतः अभिषेक होने वाले यह पवित्र शिवलिंग एक अविस्मरणीय अनुभव प्रदान करते हैं। प्रशासन और स्थानीय अधिकारियों द्वारा श्रद्धालुओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ज्वार के समय विशेष सतर्कता बरती जाती है।
