धार्मिक विद्वानों के अनुसार इस बार नाग पंचमी पर सावन सोमवार का विशेष संयोग बन रहा है, जिससे इस दिन का आध्यात्मिक महत्व और अधिक बढ़ गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नाग देवता भगवान शिव के अत्यंत प्रिय हैं और उनके गले का आभूषण हैं। यही कारण है कि इस दिन शिवजी के साथ-साथ नाग देव की उपासना करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और साधक को भय से मुक्ति मिलती है।
इस साल पूजन के लिए सुबह का समय अत्यंत फलदायी बताया गया है। 17 अगस्त की सुबह 5 बजकर 51 मिनट से 8 बजकर 29 मिनट तक पूजा का सबसे उत्तम मुहूर्त रहेगा। इस अवधि में श्रद्धालु शिव मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर स्थापित नाग देव का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक, रोली, अक्षत और पुष्प अर्पित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर सकते हैं।
धार्मिक ग्रंथों और भविष्य पुराण में नाग पंचमी के महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि इस तिथि पर नाग लोक में विशेष उत्सव मनाया जाता है, इसलिए पृथ्वी लोक पर भी नाग देव की पूजा का विधान है। महाभारतकालीन राजा जनमेजय के नाग यज्ञ और आस्तिक मुनि द्वारा नागों की रक्षा की कथा भी इस पर्व से गहराई से जुड़ी हुई है, जो जीवों के प्रति दया और संरक्षण का संदेश देती है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिनकी कुंडली में कालसर्प दोष या राहु-केतु से जुड़े कष्ट होते हैं, उनके लिए इस दिन पूजा-पाठ और दान करना विशेष लाभप्रद माना जाता है। उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में, जिनमें मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्य शामिल हैं, घर के मुख्य द्वार पर गोबर से नाग देव की आकृति बनाकर पूजन करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि धार्मिक आस्था के साथ-साथ व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना भी आवश्यक है। कई स्थानों पर जीवित सर्पों को दूध पिलाने का प्रयास किया जाता है, जो वैज्ञानिक रूप से अनुचित है। इसलिए श्रद्धालुओं को सलाह दी जाती है कि वे किसी जीव को कष्ट दिए बिना केवल मंदिर में स्थापित प्रतिमा या चित्र की ही शास्त्रीय विधि से पूजा करें।
