अमेरिका लंबे समय से भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार रहा है, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में कई ऐसे फैसले सामने आए जिन्होंने भारतीय हितों को प्रभावित किया। एच-1बी वीजा नियमों को सख्त करने की घोषणा, प्रवासन नीतियों में बदलाव और व्यापारिक मोर्चे पर टैरिफ जैसे मुद्दों ने दोनों देशों के संबंधों में नई चुनौतियां पैदा कीं। हालांकि भारत ने इन चुनौतियों का जवाब किसी टकराव या प्रतिक्रिया की राजनीति से नहीं बल्कि दूरदर्शी रणनीतिक योजना के जरिए दिया।
भारत ने सबसे पहले ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में अपनी निर्भरता को व्यापक रूप से फैलाया। पहले जहां भारत की तेल जरूरतें मुख्य रूप से पश्चिम एशिया पर निर्भर थीं, वहीं अब रूस, अमेरिका, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इराक, ब्राजील और गुयाना जैसे देशों से ऊर्जा आयात का नेटवर्क विकसित किया गया है। वेनेजुएला के साथ भी सहयोग की संभावनाओं पर काम चल रहा है। इस रणनीति का लाभ हाल के अंतरराष्ट्रीय संकटों के दौरान स्पष्ट रूप से दिखाई दिया, जब पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी चुनौतियों के बावजूद भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने में सफल रहा।
स्वास्थ्य और फार्मा क्षेत्र में भी भारत ने महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। मेडिकल उपकरणों और तकनीकी स्वास्थ्य संसाधनों के लिए चीन पर निर्भरता कम करते हुए अमेरिका, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया और इजरायल जैसे देशों के साथ सहयोग बढ़ाया गया। साथ ही मेक इन इंडिया अभियान के तहत देश में मेडिकल डिवाइस पार्क विकसित किए गए हैं। फार्मास्युटिकल उद्योग में एपीआई यानी एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट के लिए लंबे समय तक चीन पर निर्भर रहने वाला भारत अब घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय देशों के साथ साझेदारी को मजबूत कर रहा है।
तकनीक और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भी भारत ने बड़ी छलांग लगाई है। ताइवान, अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर के साथ सहयोग के जरिए भारत अपने इलेक्ट्रॉनिक्स और चिप निर्माण क्षेत्र को मजबूत करने में जुटा है। गुजरात और असम में स्थापित की जा रही सेमीकंडक्टर परियोजनाएं इसी रणनीति का हिस्सा हैं, जिनका उद्देश्य भारत को वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण केंद्र बनाना है।
रक्षा क्षेत्र में भारत ने संतुलित कूटनीति का परिचय देते हुए अमेरिका के साथ सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ फ्रांस, रूस, इजरायल और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ भी रणनीतिक संबंधों को मजबूत बनाए रखा है। इससे भारत को रक्षा उपकरणों और तकनीक के लिए किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भर होने से बचने में मदद मिली है।
व्यापार और निवेश के क्षेत्र में भी भारत ने बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया है। संयुक्त अरब अमीरात के साथ सीईपीए, ऑस्ट्रेलिया के साथ ईसीटीए, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार समझौतों की दिशा में प्रगति तथा खाड़ी देशों के साथ निवेश साझेदारी इस रणनीति के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। इसके अलावा भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा जैसी पहलें भारत की वैश्विक आर्थिक पहुंच को और मजबूत कर रही हैं।
स्पष्ट है कि बदलते वैश्विक माहौल में भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता, संतुलित कूटनीति और विविधीकरण को अपनी नीति का आधार बनाया है। यही वजह है कि वैश्विक संकटों और महाशक्तियों के दबाव के बावजूद भारत न केवल अपनी आर्थिक और सामरिक स्थिति को मजबूत बनाए हुए है बल्कि विश्व मंच पर एक विश्वसनीय और आत्मनिर्भर शक्ति के रूप में भी उभर रहा है।
