आरोप है कि जिन जमीनों को शासन ने गरीब आदिवासी परिवारों को केवल जीवनयापन और खेती के लिए दिया था, उन्हीं जमीनों की खरीद-फरोख्त अवैध तरीके से की जा रही है। रिंग रोड प्रोजेक्ट के कारण इन जमीनों की कीमत अचानक करोड़ों रुपये तक पहुंच गई है, जिसका फायदा भू-माफिया उठा रहे हैं।
मामले में सामने आए दस्तावेजों के अनुसार, मंझगवा निवासी किस्सो बाई की 0.56 हेक्टेयर जमीन 37 लाख रुपये में बेची गई थी। रजिस्ट्री में यह राशि बैंक ट्रांजैक्शन के जरिए दिखायी गई है, लेकिन पीड़िता का आरोप है कि उसे वास्तविक रूप से केवल करीब 5 लाख रुपये ही मिले। बाकी रकम का कोई स्पष्ट भुगतान नहीं हुआ।
इसी तरह एक अन्य मामले में संदीप कोल और उनके परिवार की 0.474 हेक्टेयर जमीन 33 लाख 40 हजार रुपये में बेची गई, जिसमें अलग-अलग बैंकों के जरिए भुगतान दर्शाया गया है, लेकिन पीड़ित परिवार का कहना है कि उन्हें पूरी राशि नहीं मिली और लेनदेन में गड़बड़ी की गई है।
स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि यह पूरा खेल सुनियोजित तरीके से चल रहा है, जिसमें सरकारी और अहस्तांतरणीय जमीनों को भी अवैध रूप से ट्रांसफर किया जा रहा है। दावा किया जा रहा है कि इस नेटवर्क में कई प्रभावशाली लोग भी शामिल हो सकते हैं।
प्रशासनिक जांच में यह भी सामने आया है कि ये जमीनें मूल रूप से सरकार द्वारा आदिवासी समुदाय को दी गई थीं, जिन्हें कानूनी रूप से बेचा या हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद रजिस्ट्री और बैंक ट्रांजैक्शन के जरिए बिक्री दिखाना गंभीर सवाल खड़े करता है।
जबलपुर एसडीएम अभिषेक सिंह ने मामले को गंभीर बताते हुए कहा है कि यह एक बड़े घोटाले की ओर इशारा करता है। उन्होंने कहा कि दस्तावेजों की गहन जांच की जाएगी और वह स्वयं मौके पर जाकर स्थिति का निरीक्षण करेंगे।
फिलहाल प्रशासन ने पूरे मामले की जांच शुरू कर दी है और संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल की जा रही है। इस खुलासे के बाद इलाके में हड़कंप मचा हुआ है और कई अन्य रजिस्ट्रियों की भी जांच की संभावना जताई जा रही है।
