नई दिल्ली। बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मामले के पूर्व वादी इकबाल अंसारी ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने और उसकी कुर्बानी पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि सभी धर्मों को एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए और गाय का आदर करना सामाजिक एकता के लिए जरूरी है।
उत्तर प्रदेश में बकरीद के मौके पर गाय की कुर्बानी और सार्वजनिक धार्मिक गतिविधियों को लेकर चल रही बहस के बीच बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि केस के पूर्व वादी इकबाल अंसारी का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि गाय को “गौमाता” माना जाता है और इसका सम्मान हर नागरिक की जिम्मेदारी है, चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो।
इकबाल अंसारी ने मांग की है कि सरकार गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करे, ताकि इसके संरक्षण और सम्मान को और मजबूती मिल सके। उन्होंने कहा कि गाय केवल एक पशु नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और आस्था से जुड़ी हुई है। ऐसे में उसकी कुर्बानी किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराई जा सकती।
उन्होंने यह भी कहा कि हम भारतीय मुसलमान हैं और देश की साझा परंपराओं का सम्मान करना हमारी जिम्मेदारी है। उनके अनुसार समाज में शांति और भाईचारे को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि सभी धर्म एक-दूसरे की भावनाओं को समझें और उसका सम्मान करें। उन्होंने यह भी जोड़ा कि पड़ोसी धर्म की आस्था का ध्यान रखना भी सामाजिक सद्भाव का हिस्सा है।
इकबाल अंसारी ने कहा कि गाय का दूध स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी है और इसे प्रकृति का एक उपयोगी उपहार माना जाता है। इसलिए गाय का संरक्षण और सम्मान और भी जरूरी हो जाता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस्लाम भी निर्दोष और उपयोगी जीवों के प्रति क्रूरता को बढ़ावा नहीं देता, और समाज के कुछ लोग गलत कार्यों से पूरे समुदाय को बदनाम करते हैं।
उन्होंने समाज के लोगों से अपील करते हुए कहा कि गायों के साथ किसी भी प्रकार का गलत व्यवहार नहीं होना चाहिए और जो भी ऐसा करता है, उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। उनका कहना है कि इस मुद्दे को राजनीति से दूर रखना चाहिए और केवल सामाजिक सौहार्द के नजरिए से देखा जाना चाहिए।
पूर्व वादी ने यह भी कहा कि यदि समाज में भाईचारा बनाए रखना है तो सभी धर्मों को एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना होगा। उन्होंने अयोध्या के संतों की राय का भी समर्थन करते हुए कहा कि धर्मों के बीच संवाद और सम्मान ही देश को मजबूत बनाता है।
इस बयान पर विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे सांप्रदायिक सौहार्द की दिशा में सकारात्मक कदम बता रहे हैं, तो कुछ इसे धार्मिक और राजनीतिक बहस से जोड़कर देख रहे हैं।
