इस नई योजना का पूरा नाम “विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण)” बताया गया है, जिसके अंतर्गत ग्रामीण परिवारों को साल में 125 दिन तक रोजगार देने का प्रस्ताव रखा गया है। वर्तमान व्यवस्था में 100 दिनों की रोजगार गारंटी दी जाती है, लेकिन नई योजना में इसे बढ़ाकर लोगों की आय में सुधार और पलायन को कम करने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार का मानना है कि अधिक दिनों का रोजगार मिलने से ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और गांवों में ही आजीविका के अवसर बढ़ेंगे।
योजना के संचालन में तकनीकी प्रणाली को भी प्रमुख स्थान दिया गया है। पारंपरिक जॉब कार्ड की जगह अब स्मार्ट रोजगार कार्ड दिए जाने की योजना है, जिसमें डिजिटल पहचान, फेस रिकग्निशन और ई-केवाईसी जैसी सुविधाएं शामिल होंगी। इसका उद्देश्य लाभार्थियों की पहचान को अधिक सटीक बनाना और भुगतान प्रणाली में पारदर्शिता लाना बताया जा रहा है। इसके साथ ही गांवों में होने वाले कार्यों की प्राथमिकता में भी बदलाव किया जा रहा है, जिसमें जल संरक्षण, ग्रामीण सड़कों का निर्माण, आजीविका से जुड़े कार्य और पर्यावरण तथा जलवायु आधारित परियोजनाओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
नई व्यवस्था में ग्राम पंचायतों को अपने क्षेत्र की जरूरतों के अनुसार विकास योजनाएं तैयार करने की जिम्मेदारी दी जाएगी, जिन्हें ग्राम सभा की मंजूरी के बाद लागू किया जाएगा। योजना के वित्तीय ढांचे में भी केंद्र और राज्यों की भागीदारी तय की गई है, जहां सामान्य राज्यों में खर्च का अनुपात 60:40 रहेगा, जबकि पूर्वोत्तर और पहाड़ी क्षेत्रों में यह 90:10 के अनुपात में होगा। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि मनरेगा के तहत पहले से चल रहे कार्य अचानक बंद नहीं किए जाएंगे, बल्कि उन्हें नई योजना में शामिल कर पूरा किया जाएगा ताकि किसी भी श्रमिक को रोजगार में बाधा न आए।
हालांकि इस प्रस्तावित बदलाव को लेकर विभिन्न स्तरों पर चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं। कुछ विशेषज्ञों और संगठनों का मानना है कि इस परिवर्तन के दौरान ग्रामीण मजदूरों को शुरुआती चरण में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जबकि सरकार इसे ग्रामीण विकास के एक आधुनिक और अधिक प्रभावी मॉडल के रूप में प्रस्तुत कर रही है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह नई व्यवस्था ग्रामीण रोजगार की दिशा में कितना प्रभावी साबित होती है।
