सरकार के इस फैसले के बाद कर्नाटक देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है जिसने इस तरह के मॉडल को व्यापक रूप से लागू किया है। नई व्यवस्था को वर्ष 2026-27 के बजट प्रावधानों के तहत लागू किया गया है, जिसके बाद शराब की कीमत तय करने का पूरा ढांचा बदल गया है। अब तक जहां शराब की कीमतें कई स्लैब और सरकारी नियंत्रण के आधार पर तय होती थीं, वहीं अब यह प्रक्रिया अधिक बाजार-आधारित और सरल हो गई है।
नई नीति के अनुसार इंडियन मेड लिकर की कैटेगरी में भी बड़ा बदलाव किया गया है। पहले जहां कई स्लैब मौजूद थे, उन्हें घटाकर एक सीमित संख्या में लाया गया है, जिससे टैक्स संरचना को समझना और लागू करना दोनों आसान हो गया है। सरकार का मानना है कि इस बदलाव से न केवल सिस्टम अधिक पारदर्शी बनेगा, बल्कि कर निर्धारण में अनावश्यक जटिलता भी समाप्त होगी।
आबकारी विभाग के अनुसार इस नई प्रणाली का उद्देश्य शराब की कीमतों को अधिक तर्कसंगत बनाना है, जिससे उपभोक्ताओं को वास्तविक मूल्य निर्धारण का लाभ मिल सके। इसके साथ ही सरकार का यह भी मानना है कि इस मॉडल से पड़ोसी राज्यों के बीच कीमतों का अंतर कम होगा, जिससे अवैध या सीमा पार खरीदारी पर भी अंकुश लग सकता है।
नई नीति में यह भी प्रावधान किया गया है कि अब कंपनियों को अपने उत्पादों की कीमत और श्रेणी तय करने में अधिक स्वतंत्रता मिलेगी। हालांकि यह स्वतंत्रता बाजार की मांग और गुणवत्ता के आधार पर नियंत्रित ढांचे के भीतर रहेगी। इससे उद्योग को लचीलापन मिलेगा और प्रतिस्पर्धा भी अधिक संतुलित होने की संभावना है।
सरकार का दावा है कि यह मॉडल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे आधुनिक टैक्सिंग सिस्टम में से एक माना जाता है, क्योंकि इसमें उत्पाद की वास्तविक संरचना को आधार बनाकर टैक्स लगाया जाता है। इससे न केवल राजस्व प्रणाली अधिक वैज्ञानिक बनती है, बल्कि उपभोक्ता हितों को भी बेहतर तरीके से संतुलित किया जा सकता है।
हालांकि इस बदलाव को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या वास्तव में इससे शराब की कीमतों में कमी आएगी या कंपनियां नई संरचना के तहत अपने मूल्य निर्धारण को किसी अन्य तरीके से संतुलित करेंगी। आने वाले समय में बाजार की प्रतिक्रिया और उपभोक्ता व्यवहार यह तय करेगा कि यह नीति कितनी प्रभावी साबित होती है। फिलहाल इस बदलाव ने राज्य की आबकारी नीति को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है।
