स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक यह वायरस ईबोला के बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के कारण फैल रहा है, जो इंसानों के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इस स्ट्रेन के लिए अभी तक कोई विशेष वैक्सीन या प्रभावी दवा उपलब्ध नहीं है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, कांगो के इटुरी प्रांत में ईबोला का यह 17वां बड़ा प्रकोप है। हालांकि इस बार वायरस का प्रकार अलग होने से स्वास्थ्य एजेंसियों की चिंता और बढ़ गई है। बुंडीबुग्यो स्ट्रेन पहली बार साल 2007-08 में युगांडा के बुंडीबुग्यो जिले में सामने आया था, जहां सैकड़ों लोग संक्रमित हुए थे और बड़ी संख्या में मौतें दर्ज की गई थीं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि ईबोला वायरस के कई प्रकार होते हैं, लेकिन ज़ैरे, सूडान और बुंडीबुग्यो स्ट्रेन इंसानों में सबसे ज्यादा संक्रमण फैलाते हैं। ज़ैरे स्ट्रेन सबसे घातक माना जाता है, जबकि बुंडीबुग्यो स्ट्रेन में भी मौत का खतरा 40 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह वायरस अफ्रीका के घने जंगलों में मौजूद जंगली जानवरों, खासकर चमगादड़ों से फैलता है। संक्रमित व्यक्ति के खून, शरीर के तरल पदार्थ या संपर्क में आने से यह तेजी से दूसरे लोगों तक पहुंच सकता है।
ईबोला के शुरुआती लक्षण सामान्य फ्लू जैसे दिखाई देते हैं। मरीज को तेज बुखार, सिरदर्द, कमजोरी, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द महसूस होता है। बाद में उल्टी, दस्त, पेट दर्द और गले में संक्रमण जैसी समस्याएं बढ़ने लगती हैं। गंभीर स्थिति में शरीर के अलग-अलग हिस्सों से खून बहना शुरू हो सकता है और कई बार मरीज के अंग काम करना बंद कर देते हैं।
WHO और स्वास्थ्य एजेंसियां प्रभावित इलाकों में निगरानी बढ़ाने, संक्रमित मरीजों को अलग रखने और लोगों को सतर्क रहने की सलाह दे रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते नियंत्रण नहीं हुआ तो यह संक्रमण कई देशों के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
