पाठा क्षेत्र सहित कई गांवों में 100 से ज्यादा परिवार पीढ़ियों से खजूर की झाड़ू बनाकर जीवन यापन करते थे, लेकिन अब बाजार में इसकी मांग काफी कम हो गई है। पहले जहां यह झाड़ू बेहद सस्ते दाम पर बिकती थी, वहीं अब लागत बढ़ने के बावजूद बिक्री घटने से कारीगर परेशान हैं।
कारीगरों का कहना है कि पहले खजूर के पत्ते आसानी से मिल जाते थे और झाड़ू बनाने का खर्च भी कम था, लेकिन अब कच्चे माल की कीमत बढ़ने से मुनाफा लगभग खत्म हो गया है। एक झाड़ू तैयार करने में कई दिन लगते हैं, लेकिन फिर भी उचित दाम नहीं मिल पा रहा है।
स्थानीय कारीगरों और महिलाओं ने बताया कि प्लास्टिक झाड़ुओं की बढ़ती मांग ने उनके पारंपरिक काम को लगभग खत्म कर दिया है। इससे कई परिवार आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं और रोजगार का यह पुराना जरिया धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रहा है।
