नए प्रावधान के अनुसार फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, यूट्यूब और अन्य बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नया अकाउंट बनाने से पहले यूजर की आयु की पुष्टि की जाएगी। इसके लिए कंपनियों को पहचान पत्र, पासपोर्ट या अन्य वैध सरकारी दस्तावेजों का उपयोग करना होगा। सरकार का मानना है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच बच्चों को अनुचित सामग्री, साइबर बुलिंग, ऑनलाइन शोषण और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों से बचाने के लिए यह कदम आवश्यक हो गया था। इसी उद्देश्य से ऑनलाइन सुरक्षा कानून के तहत यह व्यवस्था लागू की गई है।
नियम केवल नए यूजर्स तक सीमित नहीं है। पहले से सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे लोगों को भी निर्धारित समय सीमा के भीतर अपनी उम्र का सत्यापन कराना होगा। सरकार ने प्लेटफॉर्म कंपनियों को इस प्रक्रिया को लागू करने के लिए सीमित समय दिया है। यदि कोई कंपनी निर्धारित मानकों का पालन नहीं करती है, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है। नए कानून के तहत करोड़ों रुपये के बराबर भारी आर्थिक दंड का भी प्रावधान रखा गया है, जिससे कंपनियों पर नियमों का पालन सुनिश्चित करने का दबाव बढ़ गया है।
सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों को केवल आयु सत्यापन तक सीमित जिम्मेदारी नहीं दी है। उन्हें हानिकारक, भ्रामक और फर्जी सामग्री पर भी सख्त निगरानी रखनी होगी। साथ ही विज्ञापनदाताओं की पहचान की पुष्टि करना, संदिग्ध कंटेंट की रिपोर्टिंग व्यवस्था को मजबूत करना और एडिट या कृत्रिम रूप से बदले गए कंटेंट को स्पष्ट रूप से चिह्नित करना भी आवश्यक होगा। इससे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
मलेशिया से पहले भी कई देश बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सख्त कदम उठा चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, फ्रांस, स्पेन, ग्रीस, डेनमार्क और नॉर्वे जैसे देशों में सोशल मीडिया उपयोग की न्यूनतम आयु और डिजिटल सुरक्षा से जुड़े नियमों को लगातार मजबूत किया जा रहा है। इन देशों का मानना है कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग बच्चों के मानसिक विकास, सामाजिक व्यवहार और पढ़ाई पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, इसलिए आयु आधारित नियंत्रण आवश्यक है।
भारत में फिलहाल 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर कोई राष्ट्रीय प्रतिबंध लागू नहीं है। हालांकि डिजिटल सुरक्षा, डेटा संरक्षण और ऑनलाइन गोपनीयता को लेकर सरकार समय-समय पर नए नियम लाती रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि साइबर बुलिंग, फर्जी खबरों, ऑनलाइन धोखाधड़ी और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए भारत में भी इस विषय पर चर्चा और तेज हो सकती है। दुनिया के कई देशों में लागू हो रहे ऐसे नियम भविष्य में भारतीय नीति निर्माताओं के लिए भी विचार का विषय बन सकते हैं।
