पिछले कुछ वर्षों में एआई कंपनियां अपने मॉडल्स को इंसानों की मदद से प्रशिक्षित करती रही हैं लेकिन अब शोध एक नए स्तर पर पहुंच गया है। वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इंसानी मस्तिष्क और पक्षियों की विजुअल क्षमता किस तरह जटिल मेडिकल इमेज को समझती है और इसी प्रक्रिया को एआई में विकसित किया जा सकता है।
यह महत्वपूर्ण शोध अमेरिका के मैसाचुसेट्स स्थित कॉलेज ऑफ द होली क्रॉस में डॉ ग्रेगरी डिगिरोलामो और उनकी टीम कर रही है। उनका उद्देश्य यह समझना है कि रेडियोलॉजिस्ट एक्स रे और सीटी स्कैन देखते समय किस तरह निर्णय लेते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि कई बार इंसानी दिमाग किसी असामान्यता को महसूस तो कर लेता है लेकिन वह जानकारी अंतिम निर्णय तक नहीं पहुंच पाती। यदि इस प्रक्रिया को एआई समझ जाए तो वह डॉक्टरों की मदद करते हुए अधिक सटीक परिणाम दे सकता है।
शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने रेडियोलॉजिस्ट की आंखों की गतिविधियों का भी विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि जब डॉक्टर सीटी स्कैन में फेफड़ों की गांठों को देखते हैं तो उनकी नजर उसी हिस्से पर अधिक देर तक टिकती है और आंखों की पुतलियां भी फैल जाती हैं। कई मामलों में डॉक्टर बाद में रिपोर्ट सामान्य लिख देते हैं लेकिन दिमाग शुरुआती स्तर पर असामान्यता को महसूस कर चुका होता है। यह संकेत बताता है कि मानव मस्तिष्क अवचेतन स्तर पर कई ऐसी जानकारियां पकड़ लेता है जिन्हें बाद में निर्णय प्रक्रिया में शामिल नहीं किया जाता।
इसी सिद्धांत को और बेहतर समझने के लिए शोधकर्ताओं ने छह कबूतरों को विशेष प्रशिक्षण दिया। इन पक्षियों को सीटी स्कैन के छोटे वीडियो दिखाए गए और उनसे यह पहचानने का अभ्यास कराया गया कि फेफड़ों में गांठ मौजूद है या नहीं। वैज्ञानिकों का कहना है कि कबूतरों की विजुअल पहचान क्षमता बेहद प्रभावशाली होती है और वे सूक्ष्म अंतर भी पहचान सकते हैं। यही विशेषता भविष्य के एआई सिस्टम को अधिक संवेदनशील और सटीक बनाने में मदद कर सकती है।
डॉ डिगिरोलामो का कहना है कि इस तकनीक का उद्देश्य डॉक्टरों की जगह लेना नहीं बल्कि उनकी क्षमता को और मजबूत बनाना है। भविष्य में ऐसे एआई टूल विकसित किए जा सकते हैं जो रेडियोलॉजिस्ट के साथ मिलकर काम करें और उन संकेतों की ओर ध्यान दिलाएं जो सामान्य जांच के दौरान अनदेखे रह जाते हैं। इससे कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का शुरुआती चरण में पता लगाना आसान हो सकता है और मरीजों का इलाज समय रहते शुरू किया जा सकेगा।
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक केवल चिकित्सा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगी। भविष्य में इसका उपयोग हृदय रोगों की पहचान कला की असली और नकली कृतियों की जांच सुरक्षा एजेंसियों की स्क्रीनिंग प्रणाली और कई अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी किया जा सकता है। यदि यह प्रयोग सफल रहा तो आने वाले समय में एआई केवल तेज ही नहीं बल्कि पहले से कहीं अधिक समझदार और संवेदनशील भी बन सकता है।
