इस सर्वेक्षण के लिए 2018 से 2022 के बीच जुटाए गए आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में वयस्क और लगभग वयस्क कछुओं की संख्या करीब 1.83 लाख आंकी गई है। यह 1990 के दशक के अंतिम वर्षों में लगाए गए लगभग एक लाख कछुओं के पुराने अनुमान से काफी अधिक है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि नए आंकड़ों का यह अर्थ नहीं है कि वर्ष 1999 के बाद कछुओं की आबादी लगभग दोगुनी हो गई है। पुराने सर्वेक्षणों में घनी झाड़ियों और पेड़ों की छाया में छिपे कछुए अक्सर गिनती में शामिल नहीं हो पाते थे। इस बार वैज्ञानिकों ने उन कछुओं की संख्या का भी सांख्यिकीय अनुमान लगाया, जो सर्वेक्षण के दौरान सीधे दिखाई नहीं दिए।
अल्डाब्रा के विशाल कछुओं की आबादी में सुधार के पीछे उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा को महत्वपूर्ण माना गया है। 19वीं सदी में बड़े पैमाने पर शिकार और अन्य मानवीय गतिविधियों के कारण इनकी संख्या में भारी गिरावट आई थी। इसके बाद इस प्रजाति को बचाने के लिए संरक्षण के उपाय किए गए। वर्ष 1981 में अल्डाब्रा को सख्त सुरक्षा वाले प्राकृतिक आरक्षित क्षेत्र का दर्जा दिया गया। इसके अगले वर्ष, 1982 में, इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। लगातार संरक्षण और निगरानी से कछुओं को सुरक्षित वातावरण मिला। नए अध्ययन में यह भी सामने आया कि 2018 से 2022 के दौरान इनकी आबादी अपेक्षाकृत स्थिर रही।
सर्वेक्षण के दौरान कछुओं की संख्या और उनके आवास के बीच संबंध भी सामने आया। वैज्ञानिकों ने पाया कि घास वाले क्षेत्रों में इनकी मौजूदगी सबसे अधिक है। ऐसे क्षेत्रों को टॉरटॉइज टर्फ कहा जाता है। इसके बाद खुले भूभाग और कम घनी झाड़ियों वाले इलाकों में कछुओं का घनत्व अधिक पाया गया। इसके विपरीत, घनी झाड़ियों, मैंग्रोव और कुछ विशेष प्रकार की वनस्पतियों वाले क्षेत्रों में इन्हें देखना अधिक कठिन था। अलग-अलग प्राकृतिक परिस्थितियों में कछुओं की दृश्यता के अंतर को ध्यान में रखकर वैज्ञानिकों ने उनकी कुल आबादी का अधिक विश्वसनीय अनुमान तैयार किया।
आबादी में सुधार के बावजूद अल्डाब्रा के विशाल कछुओं के सामने कई खतरे बने हुए हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में सूखे की अवधि लंबी और बार-बार होने की आशंका है। इससे कछुओं के लिए भोजन और छाया की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। समुद्र का बढ़ता जलस्तर एटोल के निचले हिस्सों के लिए भी खतरा पैदा कर रहा है। इसके अलावा, जंगली बिल्लियां और काले चूहे कछुओं के अंडों तथा नवजात बच्चों को नुकसान पहुंचाते हैं। जंगली बकरियों को वर्ष 2012 में यहां से हटाया जा चुका है, क्योंकि वे वनस्पतियों को नुकसान पहुंचाती थीं। वैज्ञानिकों के अनुसार, भविष्य में आबादी में होने वाले बदलावों पर नजर रखने के लिए नियमित सर्वेक्षण जरूरी हैं। करीब 1.83 लाख कछुओं का नया अनुमान आगे की निगरानी के लिए आधार उपलब्ध कराएगा, जिससे पर्यावरणीय बदलावों और अन्य खतरों के प्रभाव का समय रहते आकलन किया जा सकेगा।
