प्रमोद भार्गव
सिक्किम के नामची जिले में निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजना की सुरंग में हुई दर्दनाक दुर्घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। तेज बारिश भूस्खलन और मीथेन गैस के रिसाव के बीच हुई इस घटना में कई मजदूरों की जान चली गई जबकि बचाव अभियान को भी बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। यह हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि उस विकास मॉडल पर गंभीर सवाल है जिसमें पहाड़ों की प्राकृतिक संरचना को लगातार कमजोर किया जा रहा है। आधुनिक विकास के लिए सुरंगें सड़कें रेल लाइनें और जल विद्युत परियोजनाएं आवश्यक मानी जाती हैं लेकिन यदि इनका निर्माण वैज्ञानिक अध्ययन सुरक्षा मानकों और पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखे बिना किया जाए तो यही परियोजनाएं मानव जीवन के लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं।
पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड सिक्किम और हिमालयी क्षेत्रों में सुरंग निर्माण के दौरान कई बड़े हादसे सामने आए हैं। उत्तरकाशी की सिल्क्यारा सुरंग दुर्घटना हो या तेलंगाना की श्रीशैलम परियोजना अथवा अब सिक्किम का हादसा सभी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण कार्य सामान्य इलाकों की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है। लगातार होने वाले विस्फोट ड्रिलिंग और भारी मशीनों के कंपन से पहाड़ों की भीतरी परतें कमजोर होती हैं। इसके साथ ही तेज बारिश और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक घटनाएं खतरे को कई गुना बढ़ा देती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय अभी भी भूगर्भीय दृष्टि से युवा पर्वतमाला है और इसकी चट्टानें पूरी तरह स्थिर नहीं हैं। ऐसे में बड़े पैमाने पर सुरंग निर्माण बांध परियोजनाएं और सड़क विस्तार जैसी गतिविधियां प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित करती हैं। कई स्थानों पर जंगलों की कटाई और पहाड़ों की खुदाई के कारण मिट्टी की पकड़ कमजोर हो जाती है जिससे भूस्खलन की घटनाएं बढ़ने लगती हैं। यही कारण है कि मानसून के दौरान निर्माणाधीन सुरंगों में पानी भरने मलबा गिरने और जहरीली गैस के रिसाव जैसी घटनाएं सामने आती रहती हैं।
जोशीमठ का भूधंसाव भी अनियोजित विकास की एक बड़ी चेतावनी माना गया। वैज्ञानिक रिपोर्टों में यह आशंका जताई गई थी कि अत्यधिक निर्माण गतिविधियों और सुरंगों की खुदाई से जमीन की स्थिरता प्रभावित हुई है। इसके बावजूद हिमालयी क्षेत्रों में कई नई परियोजनाओं पर तेजी से काम जारी है। यदि भविष्य में भी यही स्थिति बनी रही तो केवल पर्यावरण ही नहीं बल्कि हजारों लोगों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है।
इस स्थिति में आवश्यकता केवल विकास कार्य रोकने की नहीं बल्कि उन्हें अधिक सुरक्षित और वैज्ञानिक बनाने की है। हर परियोजना से पहले विस्तृत भूगर्भीय अध्ययन किया जाए। आधुनिक गैस मॉनिटरिंग सिस्टम मजबूत वेंटिलेशन व्यवस्था और आपातकालीन निकासी मार्ग अनिवार्य किए जाएं। मजदूरों को नियमित सुरक्षा प्रशिक्षण दिया जाए और मानसून जैसे संवेदनशील मौसम में जोखिम वाले क्षेत्रों में काम सीमित रखा जाए। साथ ही पर्यावरणीय प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन कर उसके अनुसार निर्माण प्रक्रिया तय की जाए।
देश को बेहतर सड़कें बिजली और रेल नेटवर्क की आवश्यकता है लेकिन विकास तभी सार्थक माना जाएगा जब वह मानव जीवन और प्रकृति दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। सिक्किम जैसी घटनाएं केवल संवेदना व्यक्त करने का विषय नहीं बल्कि भविष्य की नीति और निर्माण प्रणाली में व्यापक बदलाव की चेतावनी हैं। यदि समय रहते सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं दी गई तो विकास की यही रफ्तार आने वाले समय में और बड़ी त्रासदियों का कारण बन सकती है।
