यह गांव, जिसे भारी वर्षा के कारण कभी-कभी गुजरात का चेरापूंजी भी कहा जाता है, आज गर्मी के मौसम में पानी की भारी कमी से जूझ रहा है। स्थिति इतनी गंभीर है कि गांव की महिलाएं और पुरुष अपने परिवार की प्यास बुझाने के लिए 45 फीट गहरे कुओं में उतरने को मजबूर हैं। कई बार लोहे की सीढ़ियों और रस्सियों के सहारे खतरनाक तरीके से नीचे जाकर पानी निकाला जाता है, जिससे हादसे का खतरा हमेशा बना रहता है।
ग्रामीणों के अनुसार, गांव में मौजूद सरकारी कुएं भी गर्मी बढ़ते ही सूखने लगते हैं और उनमें बहुत कम पानी बचता है। ऐसे में लोगों को घंटों तक लाइन में खड़ा रहना पड़ता है ताकि वे कुछ बाल्टी पानी भर सकें। कई परिवारों को सिर्फ एक या दो बाल्टी पानी के लिए एक से दो घंटे तक इंतजार करना पड़ता है। इस दौरान महिलाएं छोटे बच्चों को साथ लेकर तेज धूप में कुएं के पास बैठने को मजबूर हैं।
पानी भरने की यह प्रक्रिया आसान नहीं है। कई बार महिलाएं और युवा कुएं में उतरते समय फिसलकर चोटिल भी हो जाते हैं। इसके बावजूद मजबूरी में यह काम रोजाना करना पड़ता है। गांव में पानी की इतनी कमी है कि हर बूंद की कीमत बढ़ती जा रही है और जीवन की बुनियादी जरूरतें भी चुनौती बन गई हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई साल पहले सरकार की ओर से बड़ी जल आपूर्ति योजना शुरू की गई थी, जिसके तहत गांव-गांव में नल लगाए गए। इस योजना पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन नलों से आज तक पानी की एक बूंद भी नियमित रूप से नहीं पहुंची। गांव के लोग इसे योजनाओं की विफलता और प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम मान रहे हैं।
हालांकि हाल के दिनों में कुछ स्थानों पर पानी की आपूर्ति शुरू किए जाने की बात सामने आई है, लेकिन यह व्यवस्था अभी भी अस्थायी और अपर्याप्त बताई जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि समस्या का स्थायी समाधान न होने तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।
यह स्थिति न केवल गांव की जीवनशैली को प्रभावित कर रही है, बल्कि यह भी सवाल खड़े कर रही है कि जब योजनाओं पर भारी-भरकम बजट खर्च किया जा रहा है, तब भी अंतिम व्यक्ति तक पानी क्यों नहीं पहुंच पा रहा। मोती पलसन गांव की यह तस्वीर ग्रामीण भारत में जल संकट की गंभीरता को उजागर करती है और विकास के दावों की वास्तविकता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।
