उदयनिधि स्टालिन ने कहा कि जब उन्होंने विधानसभा में सनातन धर्म को लेकर टिप्पणी की थी, तब उनका आशय समाज में मौजूद जाति आधारित भेदभाव और असमानता से था। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी बातों को गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया गया। उनके अनुसार, समाज में समानता और न्याय स्थापित करना ही उनका मुख्य उद्देश्य है।
उन्होंने अपने बयान में यह भी स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी और विचारधारा किसी भी धार्मिक आस्था के खिलाफ नहीं है। उन्होंने लिखा कि द्रविड़ आंदोलन की परंपरा हमेशा से सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों पर आधारित रही है। उन्होंने पेरियार, डॉ. भीमराव अंबेडकर, सी.एन. अन्नादुरई और एम. करुणानिधि जैसे नेताओं के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी सोच इन्हीं मूल्यों से प्रेरित है।
उदयनिधि ने कहा कि मंदिरों या धार्मिक स्थलों पर किसी को रोकने का सवाल ही नहीं उठता। उनका कहना था कि हर व्यक्ति को समाज और धार्मिक स्थलों में समान अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं, जिससे अनावश्यक विवाद पैदा हो रहा है।
गौरतलब है कि यह विवाद नया नहीं है। इससे पहले सितंबर 2023 में भी उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को लेकर एक विवादित टिप्पणी की थी, जिसमें उन्होंने इसकी तुलना कुछ सामाजिक बुराइयों से करते हुए इसे खत्म करने की बात कही थी। उस बयान के बाद देशभर में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भारी विरोध हुआ था और मामला अदालत तक भी पहुंचा था, जहां उन्हें कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था।
हाल ही में तमिलनाडु विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में अपने पहले भाषण में उन्होंने एक बार फिर इस मुद्दे को उठाया, जिससे विवाद दोबारा भड़क गया। विपक्षी दलों ने उनके बयान को धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताया, वहीं डीएमके ने इसे सामाजिक न्याय की लड़ाई करार दिया।
अब बढ़ते राजनीतिक दबाव और आलोचनाओं के बीच उदयनिधि स्टालिन ने अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है। हालांकि, उनके बयान के समर्थन और विरोध में राजनीतिक माहौल लगातार गरमाया हुआ है।
