कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित धार्मिक कट्टरवाद के विरोध पर केंद्रित साहित्यिक कार्यक्रम में तस्लीमा नसरीन ने हिस्सा लिया। लंबे समय बाद शहर में उनकी सार्वजनिक उपस्थिति ने साहित्य, समाज और राजनीति से जुड़े लोगों का ध्यान आकर्षित किया। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि राज्य सरकार प्रत्येक लेखक और विचारक के अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान करती है। उन्होंने तस्लीमा नसरीन को आश्वस्त किया कि वह अपनी इच्छा के अनुसार जितनी बार चाहें पश्चिम बंगाल आ सकती हैं और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि तस्लीमा नसरीन की रचनाओं को बड़ी संख्या में पाठक पढ़ते हैं और साहित्य के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने कहा कि एक लोकतांत्रिक समाज में लेखकों और बुद्धिजीवियों को अपने विचार रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। इसी भावना के तहत राज्य सरकार उनकी यात्रा और सुरक्षा से जुड़े सभी आवश्यक इंतजाम करने के लिए प्रतिबद्ध रहेगी।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए तस्लीमा नसरीन ने अपनी वापसी को प्रतीकात्मक बताया। उन्होंने कहा कि लंबे समय बाद कोलकाता लौटना इस बात का संकेत है कि अन्याय हमेशा कायम नहीं रहता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका संघर्ष किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध का नहीं, बल्कि धार्मिक कट्टरता, असहिष्णुता और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर आधारित रहा है। उनके अनुसार समाज में स्वतंत्र सोच और अभिव्यक्ति के लिए सुरक्षित वातावरण आवश्यक है।
तस्लीमा नसरीन वर्ष 1994 से निर्वासन का जीवन जी रही हैं। अपनी लेखनी और विचारों के कारण उन्हें कट्टरपंथी संगठनों की ओर से लगातार धमकियां मिलने के बाद बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था। बाद के वर्षों में वह भारत सहित विभिन्न देशों में रहीं। वर्ष 2007 में कोलकाता में उनके लेखन को लेकर हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद उन्हें शहर छोड़ना पड़ा था। इसके बाद उनकी सार्वजनिक रूप से कोलकाता वापसी नहीं हो सकी थी।
करीब दो दशक बाद उनकी यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि उन्होंने भविष्य के लिए ऐसी दुनिया की उम्मीद जताई, जहां किसी लेखक को अपने विचार व्यक्त करने के कारण अपना घर या देश छोड़ने के लिए मजबूर न होना पड़े। उन्होंने कहा कि साहित्य का उद्देश्य समाज में संवाद और विचारों का विस्तार करना है, न कि भय का वातावरण बनाना।
तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी और राज्य सरकार की ओर से दिए गए सुरक्षा आश्वासन ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लेखकों की सुरक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों पर नई चर्चा को जन्म दिया है। आने वाले समय में यह मुद्दा साहित्यिक और सामाजिक विमर्श के साथ-साथ सार्वजनिक बहस का भी महत्वपूर्ण विषय बना रह सकता है।
