नई दिल्ली। शराबबंदी (Alcohol Prohibition) के असर पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने इससे जुड़ी पांच प्रमुख ‘बुराइयां’ गिनाई हैं। कोर्ट ने कहा कि शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से राजस्व का नुकसान, प्रतिबंध लागू कराने पर खर्च, पुलिस में भ्रष्टाचार, अवैध शराब बनाने और नशीली दवाओं (Narcotic drugs) से जुड़ी समस्या जैसे खतरे पैदा हो सकते हैं।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने यह टिप्पणी महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स के नियम 18A और 18B को रद्द करते हुए की। इन नियमों के तहत मेथनॉल की खरीद को नियंत्रित किया गया था और गैर-दवा निर्माताओं को इसकी बिक्री से पहले उसमें कड़वा पदार्थ और रंग मिलाना अनिवार्य किया गया था।
कोर्ट ने शराबबंदी से जुड़े 5 ‘नुकसान’ गिनाए
सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी से जुड़े जिन पांच पहलुओं की ओर इशारा किया, वे हैं-
– राजस्व का नुकसान
– शराबबंदी लागू कराने पर होने वाला खर्च
– पुलिस में भ्रष्टाचार
– अवैध तरीके से शराब बनाने का बढ़ता कारोबार
– नशीली दवाओं से जुड़ी समस्या
पीठ ने गुजरात और दूसरे राज्यों में जहरीली शराब से हुई घटनाओं का भी जिक्र किया।
गुजरात में 600 से ज्यादा लोगों की मौत का जिक्र
एक रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि हाल में गुजरात के भावनगर और मध्य प्रदेश के सागर में हुई जहरीली शराब की घटनाएं अधिकारियों के लिए चेतावनी हैं। इन दोनों घटनाओं में क्रमशः 13 और 15 लोगों की जान गई थी। पीठ ने कहा कि इतिहास बताता है कि पूरी तरह शराबबंदी कई बार शराब के कारोबार को भूमिगत कर देती है। इससे बिना नियमन वाली और जानलेवा शराब के चलन का खतरा बढ़ जाता है।
कोर्ट ने गुजरात का उदाहरण देते हुए कहा कि राज्य में सख्त शराबबंदी नीति है। पीठ के मुताबिक, राज्य के गठन और देश की आजादी के बाद से वहां कम से कम 10 बड़ी जहरीली शराब त्रासदियां हो चुकी हैं, जिनमें 600 से अधिक लोगों की मौत हुई है।
1991 में मेथनॉल वाली जहरीली शराब से 93 मौतें
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में बनाए गए नियमों की पृष्ठभूमि का भी उल्लेख किया। ये नियम 1991 में मुंबई में मेथनॉल मिली नकली शराब पीने से 93 लोगों की मौत के बाद बनाए गए थे। इन नियमों में मेथनॉल की खरीद पर रोक-टोक और गैर-दवा निर्माताओं को इसकी बिक्री से पहले उसमें कड़वा पदार्थ और रंग मिलाने की शर्त रखी गई थी।
महाराष्ट्र सरकार की दलील खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की याचिका को स्वीकार नहीं किया और कहा कि संबंधित नियमों का जहरीली शराब की घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से कोई तार्किक संबंध दिखाई नहीं देता। पीठ ने स्पष्ट किया कि वह राज्य की मंशा पर सवाल नहीं उठा रही है। हालांकि, केवल अच्छी मंशा किसी नियम को मनमानेपन की कसौटी पर सही साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि राज्य यह बताने में असफल रहा कि मेथनॉल में कड़वा पदार्थ और रंग मिलाने की प्रक्रिया लगातार उसके इस्तेमाल को रोकने या हतोत्साहित करने में कैसे प्रभावी होगी।
‘दूसरे मिलावटी पदार्थों से नकली शराब बनाने से कैसे रोकेंगे?’
पीठ ने यह सवाल भी उठाया कि इन पदार्थों को मिलाने से जहरीली शराब पीने से होने वाली मौतों को निश्चित तौर पर कैसे रोका जा सकेगा। कोर्ट के मुताबिक, एक और अहम सवाल का जवाब भी नहीं दिया गया है- अगर मेथनॉल में कुछ पदार्थ मिलाए जाते हैं, तो दूसरे मिलावटी पदार्थों का इस्तेमाल करके नकली शराब बनाने पर रोक कैसे लगेगी। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के संबंधित नियमों को रद्द कर दिया।
