सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि आरक्षण का मूल उद्देश्य उन वर्गों को आगे बढ़ाना था जो सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए हैं। लेकिन समय के साथ जब कुछ परिवार आरक्षण का लाभ लेकर उच्च स्तर तक पहुंच चुके हैं और सामाजिक-आर्थिक रूप से सक्षम हो चुके हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उनकी अगली पीढ़ी को भी उसी लाभ श्रेणी में रखा जाना चाहिए या नहीं। इसी संदर्भ में क्रीमी लेयर की अवधारणा पर भी विस्तृत चर्चा की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन के बीच अंतर को समझना जरूरी है। उदाहरण के तौर पर यह कहा गया कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए बनाए गए ईडब्ल्यूएस मानदंड सामाजिक पिछड़ेपन पर आधारित नहीं हैं, जबकि OBC आरक्षण व्यवस्था का आधार सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन है। ऐसे में दोनों व्यवस्थाओं को एक समान मानना उचित नहीं होगा और इनके बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि समाज में सामाजिक गतिशीलता तेजी से बढ़ रही है और कई परिवार आरक्षण की सहायता से पहले ही बेहतर शिक्षा और सरकारी सेवाओं में उच्च पदों तक पहुंच चुके हैं। ऐसे में यह विचार करना जरूरी है कि आरक्षण का लाभ वास्तव में किन्हें मिलना चाहिए ताकि इसका उद्देश्य कमजोर और पिछड़े वर्गों तक सही तरीके से पहुंच सके।
अदालत की इस टिप्पणी के बाद एक बार फिर आरक्षण नीति, क्रीमी लेयर की परिभाषा और सामाजिक न्याय के संतुलन को लेकर देशभर में चर्चा तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा केवल कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक और नीतिगत स्तर पर भी गहन विचार-विमर्श की मांग करता है, ताकि व्यवस्था का लाभ सही पात्र वर्गों तक पहुंच सके और मूल उद्देश्य प्रभावित न हो।
