नई दिल्ली। गोरखपुर में मंगलवार को मुख्यमंत्री एवं गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने कहा कि सनातन धर्म की एकता में ही हमारी सुरक्षा और मजबूती है। उन्होंने कहा कि पंथ और संप्रदाय की उपासना पद्धतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन सभी का कल्याण वृहद सनातन धर्म की मजबूती में है। उनका कहना था कि 140 करोड़ लोग एक स्वर में हुंकार भरेंगे तो दुनिया की कोई ताकत सामने नहीं ठहर सकती। अलग-अलग गति प्रगति का कारण नहीं, बल्कि दुर्गति और अलग-अलग स्वर ताकत नहीं, बल्कि पराजय का कारण बनेंगे। मुख्यमंत्री गोरखनाथ मंदिर में युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 57वीं और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की 12वीं पुण्यतिथि पर आयोजित सप्त दिवसीय समारोह के तहत व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने दोनों आचार्यों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके योगदान को याद किया।
सीएम योगी ने कहा कि अयोध्या में भगवान राम और सनातन का वैभव जिन्हें स्वीकार नहीं है, वे दुष्प्रचार और भ्रम पैदा करेंगे। उन्होंने संजीवनी बूटी लेने जाते समय हनुमान जी द्वारा कालनेमि को पहचानने के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि रामभक्तों को भी भ्रम फैलाने वालों को पहचानना होगा। उन्होंने महंत दिग्विजयनाथ के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि वे भारत की आजादी को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं मानते थे। उनके अनुसार संपूर्ण स्वाधीनता के लिए सांस्कृतिक स्वतंत्रता भी जरूरी थी। महंत दिग्विजयनाथ का मानना था कि यदि सोमनाथ मंदिर की पुनर्प्राण प्रतिष्ठा हो सकती है तो अयोध्या में भी यह कार्य होना चाहिए।
मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में काशी विश्वनाथ धाम, अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि और विंध्यवासिनी धाम का भव्य स्वरूप सामने है। उन्होंने प्रयागराज महाकुंभ का उल्लेख करते हुए कहा कि इस आयोजन ने दुनिया के सामने सनातन परंपरा का सामर्थ्य रखा है। उन्होंने वृंदावन के वैष्णव कुंभ का भी उल्लेख किया। मुख्यमंत्री के अनुसार महंत दिग्विजयनाथ ने बिखरे नाथ संप्रदाय को अखिल भारतीय भेष बारह पंथ योगी महासभा के रूप में एकजुट किया था। उन्होंने कहा कि अपनी परंपरा का पालन करते हुए वृहद सनातन धर्म की एकता को मजबूत करना होगा। सीएम योगी ने कहा कि दोनों आचार्यों ने जिन विषयों के लिए अपना जीवन समर्पित किया, उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। महापुरुषों के दूरदर्शी कार्य भविष्य की मजबूत नींव तैयार करते हैं और गोरक्षपीठ तथा महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद दोनों आचार्यों के आदर्शों को आगे बढ़ा रहे हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि देश गुलाम था और संसाधनों का अभाव था, तब महंत दिग्विजयनाथ ने 1932 में महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की स्थापना की। महाराणा प्रताप को आदर्श बनाने के पीछे स्वदेश, स्वाभिमान और स्वधर्म का भाव था। उन्होंने कहा कि गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना में भी महंत दिग्विजयनाथ की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विश्वविद्यालय के लिए मठ की संपत्ति और दो संस्थाएं सरकार को देने में उन्होंने श्रेय की चिंता नहीं की।
