पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब शपथ ग्रहण समारोह में ‘वंदे मातरम्’ का पूरा संस्करण बजाया गया। इसके बाद CPM ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि सरकारी और आधिकारिक कार्यक्रमों में केवल वही हिस्सा उपयोग किया जाना चाहिए जिसे आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया है। पार्टी का तर्क है कि गीत के कुछ हिस्सों में धार्मिक प्रतीकात्मकता का उल्लेख है, जो धर्मनिरपेक्ष परंपराओं के अनुरूप नहीं माना जाता।
दूसरी ओर, BJP ने इस आपत्ति को सख्ती से खारिज करते हुए इसे राष्ट्रीय भावनाओं का अपमान बताया है। पार्टी का कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक रहा है और इसके पूरे स्वरूप का सम्मान किया जाना चाहिए। BJP नेताओं ने इसे तुष्टिकरण की राजनीति करार देते हुए विपक्ष पर वोट बैंक को साधने का आरोप लगाया है।
विवाद के केंद्र में यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या सरकारी समारोहों में किसी गीत के केवल सीमित हिस्से को ही अनुमति दी जानी चाहिए या पूरे गीत का उपयोग किया जाना चाहिए। CPM का दावा है कि 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति और बाद में संवैधानिक प्रक्रियाओं के दौरान यह माना गया था कि केवल प्रारंभिक हिस्से को ही औपचारिक रूप से मान्यता दी गई है। पार्टी यह भी कहती है कि भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर आधारित है और इसलिए ऐसे प्रतीकों का उपयोग सावधानीपूर्वक होना चाहिए।
वहीं BJP का कहना है कि इस तरह की व्याख्याएं राजनीतिक दृष्टिकोण से प्रेरित हैं और इससे राष्ट्रीय एकता पर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है। पार्टी नेताओं ने यह भी सवाल उठाया कि क्या किसी राष्ट्रीय गीत का कोई हिस्सा विवादित माना जा सकता है। इस मुद्दे ने सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक व्यापक बहस को जन्म दे दिया है।
राज्य प्रशासन ने इस विवाद से दूरी बनाते हुए कहा है कि शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन एक अलग संस्था द्वारा किया गया था और इसमें सरकार की प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी। हालांकि इसके बावजूद राजनीतिक बयानबाजी लगातार जारी है और मामला और अधिक संवेदनशील होता जा रहा है।
अब यह विवाद केवल केरल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अन्य राज्यों में भी इस तरह की बहसों के संकेत दिखाई देने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आगे चलकर राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता और सांस्कृतिक पहचान की व्यापक बहस को और तेज कर सकता है।
