उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान व्यवस्था में अलग-अलग वित्तीय प्लेटफॉर्म पर बार-बार केवाईसी कराने की बाध्यता लोगों के लिए असुविधाजनक है। इस कारण न केवल समय की बर्बादी होती है, बल्कि कई बार प्रक्रिया पूरी करने में अनावश्यक देरी भी होती है। ऐसे में एक ऐसा सिस्टम विकसित करने की जरूरत है, जो हर प्लेटफॉर्म पर समान रूप से मान्य हो और उपयोग में सहज हो।
इस दिशा में उन्होंने Securities and Exchange Board of India से आग्रह किया कि वह अन्य नियामकों के साथ समन्वय स्थापित कर एक साझा ढांचा तैयार करे। उनका मानना है कि यदि एकीकृत केवाईसी प्रणाली लागू होती है, तो इससे वित्तीय सेवाओं तक पहुंच आसान होगी और निवेशकों का भरोसा भी मजबूत होगा।
तेजी से बदलते वित्तीय माहौल को देखते हुए उन्होंने यह भी कहा कि अब नियमों को नए सिरे से सोचने की जरूरत है। पारंपरिक तरीके से केवल समस्या आने के बाद नियम बनाने के बजाय, संभावित खतरों का पहले से आकलन करना जरूरी है। इससे न केवल जोखिम कम होंगे, बल्कि बाजार की स्थिरता भी बनी रहेगी।
उन्होंने विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दुरुपयोग, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय धोखाधड़ी और साइबर खतरों का जिक्र करते हुए कहा कि ये आने वाले समय की बड़ी चुनौतियां हैं। इनसे निपटने के लिए नियमों को सख्त बनाने के साथ-साथ उन्हें लचीला भी रखना होगा, ताकि नवाचार पर रोक न लगे और सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सके।
इसके अलावा उन्होंने सुझाव दिया कि नीतियां बनाते समय आम लोगों और विशेषज्ञों की राय को भी शामिल किया जाना चाहिए। इससे नियम अधिक संतुलित और व्यवहारिक बनेंगे, जो बदलती जरूरतों के अनुसार खुद को ढाल सकें।
वित्तीय स्थिति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में उन्होंने यह भी बताया कि देश की मजबूत आर्थिक नींव और पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार नीति निर्माण में लचीलापन प्रदान करते हैं। इससे सरकार को आर्थिक विकास को गति देने और आवश्यक क्षेत्रों में निवेश बनाए रखने में मदद मिलती है।
समग्र रूप से देखा जाए तो केवाईसी प्रक्रिया को आसान और एकीकृत बनाने की पहल केवल एक सुधारात्मक कदम नहीं है, बल्कि यह पूरे वित्तीय तंत्र को अधिक प्रभावी और भरोसेमंद बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। आने वाले समय में इस दिशा में उठाए जाने वाले कदम यह तय करेंगे कि आम नागरिकों को कितनी राहत मिलती है और वित्तीय सेवाएं कितनी सुलभ बन पाती हैं।
